नागेश्वर ज्योतिर्लिंग: जानिये आखिर क्यों पार्वती ने शिव से मांगा था राक्षसों के लिए वरदान, ऐसा क्या है मंदिर का रहस्य

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग भिन्न-भिन्न जगह पर उपस्थित है उनमें से एक ज्योतिर्लिंग नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है जिसका अर्थ है नागों का ईश्वर अर्थात विष आदि से बचाने वाला आज हम सुप्रसिद्ध नागेश्वर मंदिर के बारे में जानेंगे।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग: जानिये आखिर क्यों पार्वती ने शिव से मांगा था राक्षसों के लिए वरदान, ऐसा क्या है मंदिर का रहस्य

सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा की जाती है शिव के गले में जो नाग बसते हैं वह भी उनके बहुत प्रिय हैं तथा भगवान शिव के भक्त भी है।

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग भिन्न-भिन्न जगह पर उपस्थित है उनमें से एक ज्योतिर्लिंग नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है जिसका अर्थ है नागों का ईश्वर अर्थात विष आदि से बचाने वाला आज हम सुप्रसिद्ध नागेश्वर मंदिर के बारे में जानेंगे यह द्वारका, गुजरात के बाहरी क्षेत्र में स्थित है।

भगवान् शिव का यह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग गुजरात प्रांत में द्वारका पुरी से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पुराणों में इस पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन की बड़ी महत्ता बताई गई है और यह भी कहा गया है कि जो श्रद्धापूर्वक इसकी उत्पत्ति और माहात्म्य की कथा सुनेगा वह सारे पापों से छुटकारा पाकर समस्त सुखों का वह भोग करेगा।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा :-

शिव पुराण मैं बताया गया है कि गुजरात प्रांत में एक सुप्रिय नाम का वैश्य रहता था, जो भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। वह भोजन और जल ग्रहण करने से पूर्व तल्लीन होकर भगवान शिव की पूजा और अर्चना करता था। वहीं दारुक नाम का एक राक्षस सुप्रिय को बहुत तंग करता था और उसकी पूजा में हमेशा ही विघ्न उत्पन्न करता था। एक बार सुप्रिय को दारुक ने उसके मित्रों सहित पकड़कर कैद कर लिया।

सुप्रिया उसके कैद में भी भगवान शिव की निरंतर पूजा अर्चना करते रहा। वहीं जब कैदी अवस्था में भी सुप्रिय द्वारा भगवान शिव की पूजा अर्चना की बात दारुक ने सुनी, तब उससे बर्दाश्त नहीं हुआ और वह सुप्रिय को खत्म करने के इरादे से उसके पास आया।

दारूक को पास देख कर सुप्रिय डरा नहीं, लेकिन अपने मित्रों की चिंता उसे ज़रूर सताए जा रही थी। उसने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वह आकर उसके मित्रों की रक्षा करें। भगवान अपने भक्तों की बात को कैसे टालते ठीक तभी भगवन शिव वहां प्रकट हुए और सुप्रिय को पाशुपतास्त्र प्रदान कर दारुक राक्षस को खत्म करने को कहा। इस घटना के बाद सुप्रिय अपने जन्म जन्मांतर से मुक्त होकर भगवान शिव के धाम को चला गया और उस स्थान पर नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना हो गई।

मंदिर की समय सारिणी

नागेश्वर मंदिर सुबह पांच बजे प्रात: आरती के साथ खुलता है जबकि आम जनता के लिए मंदिर छ: बजे खुलता है।

सुबह से ही मंदिर के पुजारियों द्वारा कई तरह की पूजा और अभिषेक किए जाते हैं।

भक्तों के लिए शाम चार बजे श्रृंगार दर्शन होता है जिसके बाद गर्भगृह में प्रवेश बंद हो जाता है।

आरती शाम सात बजे होती है तथा रात नौ बजे मंदिर बंद हो जाता है।

त्यौहारों के समय यह मंदिर ज्यादा समय के लिए खोल दिए जाते हैं।

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