रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग: अद्भुत मान्यताओं से जुड़ा है यह ज्योतिर्लिंग, जिसकी स्थापना स्वयं प्रभु श्रीराम ने की थी

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग काफी अद्भुत मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना खुद स्वयं राम भगवान ने की थी इसलिए इसका नाम रामेश्वरम है।
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग: अद्भुत मान्यताओं से जुड़ा है  यह ज्योतिर्लिंग, जिसकी स्थापना स्वयं प्रभु श्रीराम ने की थी

एक धर्म प्रधान देश होने के कारण भारत में तीर्थों की काफी अधिक महत्ता है। इसी को देखते हुए भारत में चार धार्मिक धाम बनाए गए जो चारों दिशाओं क्रमशः उत्तर में बद्रीनाथ,दक्षिण में रामेश्वरम,पूरब में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारकापुरी स्थित है। इन चारों में से एक रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग काफी अद्भुत मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना खुद स्वयं राम भगवान ने की थी इसलिए इसका नाम रामेश्वरम है।

रामायण काल से जुड़ा है इसकी मान्यताएं :-

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि जब भगवान् श्री राम लंका पर चढ़ाई कर सीता जी को छुड़ाने जा रहे थे तब इसी स्थान पर उन्होंने समुद्र की रेत से शिवलिंग बनाकर उसका पूजन किया था। ये भी मान्यता है कि इसी स्थान पर ठहरकर भगवान श्रीराम जल पी रहे थे कि आवाज़ आई मेरी पूजा किए बिना ही जल पी रहे हो?

इस वाणी को सुनकर श्री राम ने बालू से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की तथा भगवान शिव से रावण पर विजय प्राप्त करने का वर मांगा तभी भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ प्रकट हुए और श्री राम को विजय का आशीर्वाद दिया। भगवान राम ने शिवजी से लोक कल्याण के लिए उसी स्थान पर शिवलिंग के रूप में हमेशा के लिए निवास करने को कहा जिसे भगवान शिव ने स्वीकार कर लिया। तभी से यह ज्योतिर्लिंग यहां विराजमान है।

इस ज्योतिर्लिंग के बारे में दूसरी मान्यता यह है कि जब भगवान श्रीराम रावण का वध करके लौट रहे थे तब उनका पहला ठहराव समुद्र के उस पार गन्धमादन पर्वत पर था। वहां बहुत से ऋषि-मुनि भगवान श्रीराम के दर्शन के लिए उनके पास आए।

उन सभी का आदर-सत्कार करते हुए भगवान राम ने उनसे कहा रावण का वध करने के कारण मुझ पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया है, आप लोग मुझे इससे मुक्ति का कोई उपाय बताइए। यह बात सुनकर वहां मौजूद सारे ऋषियों-मुनियों ने एक स्वर से कहा कि आप यहां शिवलिंग की स्थापना कीजिए। इससे आप ब्रह्म हत्या के पाप से छुटकारा पा जाएंगे।

भगवान राम ने उनकी यह बात स्वीकार कर हनुमान को कैलाश पर्वत जाकर वहां से शिवलिंग लाने का आदेश दिया। हनुमान जी तत्काल प्रभाव से वहां गए किंतु वो भगवान शिव के दर्शन नहीं कर सके। इसलिए वे उनका दर्शन प्राप्त करने के लिए वहीं बैठकर तपस्या करने लगे।

कुछ समय पश्चात शिवजी के दर्शन प्राप्त कर हनुमान जी शिवलिंग लेकर लौटे लेकिन तब तक शुभ मुहूर्त्त बीत जाने की आशंका के कारण सीता जी द्वारा शिवलिंग स्थापित करा दिया गया था। हनुमानजी यह सब देखकर बहुत दुखी हुए। उन्होंने अपनी व्यथा भगवान राम से सुनाई तब भगवान राम ने हनुमान से कहा कि तुम चाहो तो इसे उखाड़कर हटा दो।

हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न होकर उस लिंग को उखाड़ने लगे, किंतु बहुत प्रत्यन करने पर भी वह टस-से मस नहीं हुआ। अंत में उन्होंने उस शिवलिंग को अपनी पूंछ में लपेटकर उखाड़ने की कोशिश की फिर भी वह ज्यों का त्यों अडिग बना रहा।

उलटे हनुमान जी ही झटका खाकर एक कोस दूर मूर्च्छित होकर जा गिरे। उनके शरीर से रक्त बहने लगा यह देखकर सभी लोग अत्यंत व्याकुल हो उठे। माता सीता जी पुत्र से भी प्यारे अपने हनुमान के शरीर पर हाथ फेरती हुई विलाप करने लगीं। मूर्च्छा दूर होने पर हनुमान जी ने भगवान श्रीराम को परम ब्रह्म के रूप में सामने देखा।

भगवान ने उन्हें शंकरजी की महिमा बताकर उनका प्रबोध किया। हनुमानजी द्वारा लाए गए लिंग की स्थापना भी वहीं पास में करा दी। जिसका नाम 'हनुमान लिंग' दिया गया। इसके बाद सीता माता द्वारा स्थापित 'राम लिंग' की पूजा अर्चना की गई। वहीं श्रीराम ने यह निर्देश दिया कि 'राम शिव लिंग' के दर्शन से पूर्व 'हनुमान शिवलिंग' के दर्शन अनिवार्य है, वरना शिव का आशीर्वाद प्राप्त नहीं होगा।

इसीलिए कभी भी रामेश्वरम में आप सबसे पहले के 'हनुमान शिवलिंग' के दर्शन करते हैं, उसके बाद ही आपको 'राम शिवलिंग' के दर्शन प्राप्त होते हैं।

जो भी रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए जाता है तो उसे उसी टापू पर स्थित धनुष्कोटी नामक स्थान पर जरूर जाना चाहिए क्योंकि यहीं से भगवान शिव ने लंका पर चढ़ाई के लिए पत्थरों के पुल का निर्माण किया था। कहा जाता है कि बंदरों द्वारा निर्मित इस पूल के प्रत्येक पत्थर पर भगवान राम का नाम लिखा गया था और श्री राम के नाम लिखे पत्थर डूबे नहीं और पानी में तैरते रहे, जिस पर चढ़कर वानर सेना लंका पहुंची और भगवान राम के विजय में सहायता की।

रामेश्वरम में दर्शन का समय :-

मंदिर में दर्शन करने का समय सुबह 5 बजे से दोपहर 1 बजे तक होता है। इस मंदिर में आप रात 8 बजे तक ही दर्शन कर सकते हैं।

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