त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग: गौतम ऋषि और गंगा नदी से जुड़ी है इसकी कथा, यहां पूजा करने से मिलती है काल सर्प दोष से मुक्ति

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता इसलिए है क्युकी भगवान शिव के साथ ब्रह्मा और विष्णु विराजमान है ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि त्र्यंबकेश्वर मंदिर के अंदर एक छोटे से गड्ढे में तीन छोटे-छोटे लिंग है।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग: गौतम ऋषि और गंगा नदी से जुड़ी है इसकी कथा, यहां पूजा करने से मिलती है काल सर्प दोष से मुक्ति

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग जोकि नासिक से 30 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के पश्चिम में स्थित है यह ज्योतिर्लिंग त्रयंबक गांव में स्थित है त्र्यंबकेश्वर मंदिर की भव्य इमारत सिंधु-आर्य शैली का उत्कृष्ट नमूना है।

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता इसलिए है क्युकी भगवान शिव के साथ ब्रह्मा और विष्णु विराजमान है ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि त्र्यंबकेश्वर मंदिर के अंदर एक छोटे से गड्ढे में तीन छोटे छोटे लिंग है।

जिन्हें ब्रह्मा विष्णु और शिव देवों के प्रतीक माना गया है बाकी सभी ज्योतिर्लिंगों से इसलिए इस ज्योतिर्लिंग को सबसे विशेष दर्जा दिया गया है बचे हुए ज्योतिर्लिंगों में केवल एक यही ज्योतिर्लिंग है , जिसे भगवान शिव के अलावा ब्रह्मा, विष्णु तीनों का वास है त्र्यंबकेश्वर मंदिर और गाँव ब्रह्मगिरि नामक पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। इस गिरि को शिव का साक्षात रूप माना जाता है। इसी पर्वत पर पवित्र गोदावरी नदी का उद्गमस्थल है।

इस मंदिर का निर्माण काले पत्थरों से हुआ है इस मंदिर का स्थापत्य शैली भी अत्यंत अद्भुत है यह मंदिर गोदावरी नदी के किनारे स्थित है इस मंदिर को शिव का साक्षात रूप इसलिए माना जाता है क्योंकि यह ब्रम्हगिरी नामक पहाड़ी पर स्थित है और इसी पहाड़ी से पवित्र नदी गोदावरी का उद्गम हुआ है

त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा :-

प्राचीन समय में ब्रह्मगिरी पर्वत पर देवी अहिल्या के पति ऋषि गौतम रहते थे और तपस्या करते थे। क्षेत्र में कई ऐसे ऋषि थे जो गौतम ऋषि से ईर्ष्या करते थे और उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करते रहते थे। एक बार सभी ऋषियों ने गौतम ऋषि पर गौहत्या का आरोप लगा दिया।

सभी ने कहा कि इस हत्या के पाप के प्रायश्चित में देवी गंगा को यहां लेकर आना होगा। तब गौतम ऋषि ने शिवलिंग की स्थापना करके पूजा शुरू कर दी। ऋषि की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी और माता पार्वती वहां प्रकट हुए। भगवान ने वरदान मांगने को कहा।

तब ऋषि गौतम से शिवजी से देवी गंगा को उस स्थान पर भेजने का वरदान मांगा। देवी गंगा ने कहा कि यदि शिवजी भी इस स्थान पर रहेंगे, तभी वह भी यहां रहेगी। गंगा के ऐसा कहने पर शिवजी वहां त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप वास करने को तैयार हो गए और गंगा नदी गौतमी के रूप में वहां बहने लगी। गौतमी नदी का एक नाम गोदवरी भी है।

विशेष नियम त्र्यंबकेश्वर मंदिर के :-

जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि इस ज्योतिर्लिंग में तीन देवता यानी कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वाश है।

त्र्यंबकेश्वर शिवलिंग की एक विशेषता यह भी है कि यह आकार में काफी छोटा है। जिसकी वजह से भक्तजनों को प्रवेश नहीं दिया जाता दर्शन के लिए केवल उन्हें शिवलिंग के ऊपर एक शीशा लगा हुआ है। जिससे भगवान के दर्शन करने होते हैं। मंदिर के समीप एक कुंड बना हुआ है और लोगों का मानना यह भी है कि कुंड में स्नान करने के बाद अगर कोई शिवलिंग के दर्शन करें तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।

यहाँ का एक प्रमुख नियम यह भी है की गर्भ ग्रह में प्रवेश के लिए पुरुषों को ऊपर किसी भी प्रकार का वस्त्र पहनने की मनाई है। इसके अलावा उन्हें किसी भी प्रकार के चमड़े की वस्तु को अंदर ले जाना भी वर्जित है।

समय सारणी :-


दर्शन का समय 5:30 से 9:00 तक
5:30 बजे मंगल आरती
7:00 से 9:00 तक विशेष पूजा : रुद्राभिषेक,लघुरुद्रभिषेक और मृत्युंजय मंत्र, काल सर्प
1:00 PM: मध्याह्न आरती

त्र्यंबकेश्वर मंदिर की प्रसिद्ध पूजा :-

यह पूजा पुरानी बीमारियों से छुटकारा पाने और एक स्वस्थ जीवन के लिए की जाती है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर में महामृत्युंजय पूजा सुबह 7 बजे से 9 बजे के बीच होती है।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर में रुद्राभिषेक :-

यह अभिषेक पंचामृत यानि दूध, घी, शहद, दही और शक्कर के साथ किया जाता है। इस दौरान कई मंत्रों और श्लोकों का पाठ भी किया जाता है। यह 7:00 से 9:00 बजे के बीच भी किया जाता है।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर में लघु रुद्राभिषेक :-

यह अभिषेक स्वास्थ्य और धन की समस्याओं को हल करने के लिए किया जाता है। यह कुंडली में ग्रहों के बुरे प्रभाव को भी दूर करता है।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर में काल सर्प पूजा :-

यह पूजा राहु और केतु की दशा को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है। काल सर्प दोष से ग्रसित लोग इससे मुक्ति पाने के लिए अनंत कालसर्प, कुलिक कालसर्प, शंखापान कालसर्प, वासुकी कालसर्प, महा पद्म कालसर्प और तक्षक कालसर्प नाम की पूजा की जाती है।

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