स्टूडेंट हैं या गिनीपिग! ...हॉस्टल, न पढ़ाई, न हाथ में किताबें, एकेटीयू (AKTU) के इस एग्जाम फीवर का सबब क्या है?
AKTU campus

स्टूडेंट हैं या गिनीपिग! ...हॉस्टल, न पढ़ाई, न हाथ में किताबें, एकेटीयू (AKTU) के इस एग्जाम फीवर का सबब क्या है?

AKTU फाइनल एग्जाम कराने जा रहा है. इसके लिए छात्रोंको दूरदराज से कैंपस में आकर एग्जाम देना होगा. लेकिन उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि उन हजारों बच्चों का क्या होगा जो हॉस्टल में रहकर पढ़ते हैं और 6 माह से घरों में कैद हैं. सवाल बहुत से हैं...

कोरोना संकट के ऐसे दौर में जब प्रधानमन्त्री स्वयं नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर आयोजित कांफ्रेंस तक को दूर बैठकर ‘ऑनलाइन’ सम्बोधित करते हों, अपने बड़े नेताओं-मुख्यमंत्रियों तक से दो गज की दूरी से या ऑनलाइन ही बात करते हों, राम मन्दिर शिलान्यास और भूमि पूजन जैसे लोकलुभावन कार्यक्रम में महज 200 अतिथियों की सीमा बाँध दी जाती हो, ऐसे में दूर दराज के शहरों से बुलाकर हजारों छात्रों को ‘एग्जाम फीवर’ में झोंकना कहां की बुद्धिमानी और किन-किन जिम्मेदारों की समझदारी की उत्पति है! यूपी के लोगों में अभी यह सवाल जोर मार रहा है!

हुआ यह कि, यूजीसी ने निर्देश दिए और उत्तर प्रदेश सरकार ने उसे कुछ और सख्ती के साथ पालन करने का आदेश दे डाला. डॉ एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी (AKTU) ने भी ‘आदेशों’ की ‘गम्भीरता’ देख आनन-फानन न सिर्फ आदेश दिया, बल्कि अंतिम वर्ष के छात्रों के एग्जाम के लिए कलेंडर भी जारी कर दिया. अलग बात है कि कालेजों ने अभी तक छात्रों को यह भी सूचना देना जरूरी नहीं समझा है कि उनके एग्जाम ‘सेल्फ सेंटर’ पर होंगे या कहीं और? यह भी नहीं पता है हॉस्टल वाले बच्चों को क्या करना होगा? अधिकांश बच्चों को तो यह भी नहीं पता कि इस बार उनके एग्जाम का पैटर्न बदला हुआ होगा, यानि उन्हें एमसीक्यू (MCQ) पैटर्न में जाना होगा. यह बात सिर्फ मीडिया में आई है, किसी सर्कुलर या बच्चों के किसी ईमेल कम्युनिकेशन या व्हात्सप ग्रुप (whatsapp group) में नहीं.

नतीजा, छात्र और अभिभावक परेशान हैं कि एक दिन में सारे (तीन) पेपर देने का AKTU का यह फरमान आखिर वे कैसे पूरा कर पाएंगे. छात्रों की मुश्किल ये है कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि 6 माह के ‘घर कैद’ (लॉकडाउन) के बाद वे किस तरह से एग्जाम देंगे. उन छात्रों की दिक्क्त और ज्यादा बढ़ गई है जो हॉस्टलर हैं और लम्बे समय से बिना स्टडी मेटेरियल के हॉस्टल से दूर अपने घरों में कैद हैं. दरअसल फाइनल इयर के इन स्टूडेंट्स की दिक्कत ये है कि होली में ये चंद रोज के लिए अपने घरों को आये थे और फिर अचानक ‘कोरोना लॉकडाउन’ के कारण वहीँ के होकर रह गये. इनकी किताबें और सारा स्टडी मटेरियल ही नहीं, उनके कपड़े और अन्य जरूरी सामान भी हॉस्टल में ही हैं!

ऐसे में सीधा सवाल है कि ये बच्चे एग्जाम के लिए पढ़ाई कैसे करेंगे? क्या इनके लिए हॉस्टल खुलेगा? अगर खुलेगा तो कब खुलेगा? यह भी कि लगभग 6 माह से बंद होने के कारण समझा जा सकता है कि इन हॉस्टल्स का क्या हाल होगा? और यह भी कि इन छात्रों के लिए एग्जाम के पूर्व कुछ दिन हॉस्टल में रहकर तयारी किये बिना एग्जाम देना कैसे सम्भव होगा? और यह कितना व्यावहारिक होगा!

ये पूछ रहे हैं कि प्राविधिक शिक्षा मंत्री, उनका पूरा अफसरी अमला और AKTU के वीसी महोदय ने एक बार भी क्या यह सोचा कि प्रदेश के इंजीनियरिंग कालेजों में पढ़ने वाले बच्चों की बड़ी संख्या (लगभग आधी या उससे कुछ कम) कालेज के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करती है और इनमें से कम से कम 40 फीसदी लड़कियां होती हैं!

कुछ जरूरी सवाल... 1- हॉस्टल में रहने वाले हजारों बच्चे-बच्चियां 500-1000 किलोमीटर दूर से एग्जाम देने कैसे आयेंगे? 2- एग्जाम भले ही एक दिन का हो, इन्हें कम से कम दो दिन पहले अपने कालेज वाले शहर में पहुंच जाना होगा. इस दौरान के 2-3-4 दिन ये कहां रहेंगे (hostel आप खोलेंगे नहीं, होटल अभी खुले नहीं)? 3- अपने-अपने शहरों से ये कैसे आयेंगे और कहां रहेंगे? 4- हॉस्टलर्स को उनका स्टडी मटेरियल कैसे मिलेगा, जो 6 माह से उनके कमरों में बंद है? 5- इस पूरे मामले में online exams me क्या दिक्कत है? 6- एग्जाम के लिये आवाजाही की इस आपाधापी में इन बच्चों या उनके अभिभवकों को किसी तरह के संक्रमण का जोखिम नहीं होगा, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

यहाँ यह बताना या कि याद दिलाना जरूरी है कि अब जब टेक्नीकल यूनिवर्सिटी ने फाइनल इयर के ‘सारे एग्जाम एक ही दिन’ करा लेने का फैसला कर ही लिया है और इसमें बस एक माह का वक्त ही बचा है, तो लगे हाथ यह भी बता देना था कि इससे लाभ क्या होगा? और अगर यह सिर्फ एक रस्म अदायगी है तो फिर इसकी भी क्या जरूरत, बच्चों को ऐसे ही बिना एग्जाम के क्यों नहीं प्रोमोट कर दिया जाना चाहिये था!

क्योंकि एक ही दिन में 1-1 घंटे के अन्तराल पर 2-2 घंटे के तीन एग्जाम लेना किसी भी नजरिये से व्यावहारिक नहीं है. वह भी बिलकुल नये पैटर्न पर! एक बात और, यूनिवर्सिटी ने इस बारे में कुछ भी साफ़ नहीं किया है कि हॉस्टल में रहने वाले छात्र जो अब दूर-दराज अपने घरों में हैं, कैसे इस ऑन-कैंपस एग्जाम में शामिल होंगे. क्योंकि कालेज और यूनिवर्सिटी के स्रोत तो यही बता रहे हैं कि हॉस्टल खोलने का कोई इरादा नहीं है! संदर्भवश बता दें कि, अकेले NCR में ही 150 से कुछ ही कम कालेज होंगे और जाहिर है इनमें 40 फीसदी छात्र हॉस्टलर होते हैं और जिनमें छात्र-छात्राएं दोनों शामिल हैं. 70 के आसपास तो सिर्फ गाजियाबाद में हैं.

ऐसे में फिर ये सवाल कि दूसरे शहरों से आने वाले बच्चे अपने-अपने इलाके से कैसे आयेंगे और कहां रहकर कैसे एग्जाम देंगे? इस दौरान बिना स्टडी मेटेरियल के इनकी पढ़ाई कैसे होगी? क्या इन्हें अपने शहर से कालेज जाकर हॉस्टल से अपनी किताबें और सामान लाने को कहा जायेगा? यदि ऐसा है तो क्या उस 6 माह से बंद पड़े हॉस्टल में साफ़-सफाई-सैनिटाइजेशन की ऐसी व्यवस्था होगी कि छात्र बेहिचक वहां जाकर अपना स्टडी मटेरियल लेकर आ सके? और यदि यह सम्भव है तो समय रहते ऐसी व्यवस्था भी क्यों नहीं की जा सकती कि हॉस्टल साफ़-सफाई-सैनीटाइजेशन के साथ खोल दिए जाएं ताकि बच्चे वहां रहकर सुरक्षित माहौल में एग्जाम दे सकें!

या कि इस मामले में मंत्रालय और यूनिवर्सिटी के पास कुछ अलग प्लान है?

यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि स्टडी मटेरियल तो दरकिनार, फरवरी के बाद से इनकी एक भी क्लास नहीं हुई है. ऑनलाइन के नाम पर जो कुछ हुआ वह भी किसी फर्ज अदायगी से बहुत अलग तो नहीं ही था!

दरअसल चिंता की बात ये भी है कि जिम्मेदार लोग आखिर यह क्यों भूल जा रहे हैं कि ये कोई elementary school exams नहीं हैं. गाजियाबाद या नोएडा या यूपी के किसी भी शहर के कालेज में लखनऊ, सीतापुर, गोरखपुर या दूरदराज कहीं से भी आकर कोई छात्र बिना आराम के एक दिन में तीन-तीन पेपर कैसे दे सकेगा. वो इसके लिए कब आएगा, कब वापस जाएगा, कैसे यात्रा करेगा, कहां ठहरेगा... क्या यूनिवर्सिटी या मंत्रालय ने इसके बारे में कोई प्लान तय्यार किया है? याद दिलाने की जरूरत नहीं कि एक-एक एग्जाम दिलाने के लिए जब बच्चे गार्जियन के साथ आते हैं, तो तीन घंटे वाले एक एग्जाम में भी सेंटर के बाहर कैसी अफरा-तफरी रहती है. ऐसे में इन बच्चों, जिनमें लगभग आधी छात्राएं होंगी, के बारे में जिम्मेदारों के पास क्या प्लान है?

कुल मिलाकर अभी तक जितना कुछ सामने आया है उससे तो यही लगता है कि प्राविधिक शिक्षा मंत्रालय यानी राज्य सरकार और यूनिवर्सिटी प्रशासन, कोई भी न तो बच्चों के शैक्षणिक भविष्य के प्रति चिन्तित है और न ही महामारी के इस भयावह दौर में उनके जीवन के प्रति. उन्हें यह सवाल क्यों नहीं परेशान कर रहा कि जब मौजूदा माहौल में घर से निकल कर बाजार जाने तक में इतनी एहतियात बरतनी पड़ रही हो, हम और हमारे बच्चे 6 माह से लगभग हाउस अरेस्ट हों, ऐसे में कोई 500-600 किलोमीटर या उससे भी ज्यादा की यात्रा किस साधन से और कैसे करेगा. लडकियाँ यह सब कैसे मैनेज करेंगी!

प्रशासनिक भूमिका में सक्रिय रहने वाले एक प्रोफेसर सलाह दे रहे हैं कि एग्जाम के लिए छात्रों को ‘अपनी कार’ से जाना चाहिये! ऐसे प्रोफेसर या अन्य जिम्मेदारों को यह समझना जरूरी होगा कि आपके कालेजों तक पहुंचे छात्रों में बहुत बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की है, जो किसी तरह कर्ज लेकर पढ़ाई कर रहे हैं. यह सुझाव भी कुछ कुछ वैसा ही है, जहाँ छोटे-छोटे बच्चों को ऑनलाइन क्लासेज के नाम पर उनके गार्जियन को ऐसे अंधे कुएं में धकेल दिया गया है जहाँ से उनके लिए निकलना आसान नहीं है. वैसे भी इस वक्त एक तो न कोई साधन उपलब्ध है और जो है भी, वह कोविड के लिहाज से सुरक्षित नहीं है.

एक बात और, अगर छात्र कोई इंतजाम करके जैसे-तैसे पहुंच भी गये तो चाहकर भी उन्हें कोई होटल इस माहौल में नहीं मिलने जा रहा. ऐसे में कम से कम 2 से 3 दिन के प्रवास में वे कहां और कैसे रहेंगे? यह बड़ा सवाल है.

ऐसे में यही सुझाव है कि यदि एग्जाम लेना ही है तो सबसे पहले ये सारी व्यवस्थाएं की जानी चाहिये. वरना अगर खानापूरी ही करनी है तो बच्चों और उनके अभिभावकों का जीवन खतरे में डाले बिना ऑनलाइन एग्जाम लेकर उन्हें इस बड़े संकट से बचा लिया जाना चाहिए.

सवाल है कि जब देश के गृहमंत्री से लेकर तमाम पॉवरफुल राजनेता, ब्यूरोक्रेट और चिकित्सक तक तमाम सुविधाओं और एहतियात के बावजूद कोरोना संक्रमण की चपेट में आ जा रहे हों, जानें चली जा रही हों, तो ऐसे में इतनी मासूम जिंदगियों को जानबूझकर एक बड़े खतरे में धकेलने का क्या औचित्य है?

अंत में सभी जिम्मेदारों से एक जरूरी सवाल..... कि अगर आप ये सब बातें नहीं मानते हैं और अपनी अव्यावहारिक जिद पर अड़े रहते हैं और उन्हें इस खतरे में धकेल ही देते हैं, तो क्या भविष्य में उनके सामने आने वाले किसी संकट, उनको होने वाले संक्रमण की जिम्मेदारी आप लेंगे? इसका सीधा जवाब भी आपको समय रहते दे देना चाहिए! एक बात और...अगर covid-19 की महामारी पर अपना काबू दिखाने के लिए यह सब कर के सिर्फ अपनी पीठ ठोकनी/ठोकवानी है, अपना स्कोर सुधारना है तो कुछ भी कीजिये, विधान सभा का सत्र बुलवाइए (20 अगस्त से होने जा रहा है), मन्दिर बनवाइए, रैली करवाइए लेकिन कम से कम इन निर्दोष-मासूम बच्चों को तो अपने इस प्रयोग का गिनीपिग न ही बनाइए.

Note:

बीटेक अंतिम वर्ष के कुछ छात्रों ने अपनी चिंता साझा करते हुए अपने कुछ सवाल हमें भेजे थे, जो इस प्रकार हैं...

Dear Sir, There are some serious issues with the University's (AKTU’s) decision on conducting the exams of the final year students in this pandemic situation…i.e. …

1. Conducting all the exams in a single day is a major cause of worry. It just looks like a formality.

2. Hostellers are left without any study materials at home. One can't appear for an examination without proper preparation.

3. Study materials aside, no proper classes were not conducted after February 2020.

4. It's not still confirmed that the exams will be self-centered. 1000-1200 students (from each collages) traveling to other centers for exams is extremely risky as the pandemic rages on.

5. The condition of the hostels is still unclear. Colleges have not decided yet whether the students can stay in hostels or not.

6. These are not elementary school exams. They can't just expect the students to travel from far cities and write 3 exams in a row without proper rest.

7. Authorities must be aware of the fact that neither proper convenience nor hotels are available in this pandemic situation, where one can stay for 2 or 3 days for exams.

8. If the authorities are not serious enough regarding this, they might as well conduct the exams online. It will be an unfair evaluation either way.

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