रमणीक सिंह, सुशील शुक्ल, पंकज चतुर्वेदी, इब्बार रब्बी, नेहा बहुगुणा और नलिन रंजन सिंह (L to R)
रमणीक सिंह, सुशील शुक्ल, पंकज चतुर्वेदी, इब्बार रब्बी, नेहा बहुगुणा और नलिन रंजन सिंह (L to R)
आर्ट एंड कल्चर

... और इस तरह मनुष्य की यातना के खिलाफ एक बड़ी कविता की रचना होती दिखाई दी...

हिन्दी रंगमंच की जानी पहचानी शख्सियत विजय नरेश की स्मृतियों को ताजा करने के लिए गुरुवार की शाम जब कई शहरों के रचनाकार इकट्ठे हुए तो कुछ ऐसा समां बंधा कि वक्त का पता ही न चला.

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लखनऊ ने गुरुवार को रंगमंच की दुनिया की जानी-मानी शख्सियत विजय नरेश को याद किया. विजय नरेश देश-विदेश में एक संस्कृतिक दूत की तरह काम करती रहीं. यह शाम उन्हीं के नाम रही. उनके करीबियों ने अपनी यादों के सहारे बताया कि विजय नरेश क्या थीं. मशहूर रंगकर्मी, लेखक और इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश ने उनके होने को अत्यंत आत्मीयता के साथ रेखांकित किया. विजय नरेश का एक परिचय यह भी था कि वे वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की पत्नी थीं. उनकी बेटी, हिन्दी सिनेमा और रंगमंच का चिरपरिचित नाम पूर्वा नरेश में उनके व्यक्तित्व की एक झलक दिखायी पड़ती है.

विजय नरेश की स्मृति में हर वर्ष वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की पहल पर होने वाले आयोजन में कभी नाटक, कभी कविता तो कभी कोई और कलात्मक प्रस्तुति दिखती है. इस बार काव्यपाठ की संध्या थी, दिल्ली से आये वरिष्ठ कवि इब्बार रब्बी की अध्यक्षता में. कानपुर से मशहूर कवि पंकज चतुर्वेदी, भोपाल से युवा कवि सुशील शुक्ला तथा मुंबई से युवा कवि रमणीक सिंह और नेहा बहुगुणा इसके लिए खासतौर से आये. कार्यक्रम कैफी आजमी सभागार, निशातगंज में हुआ.

... और इस तरह मनुष्य की यातना के खिलाफ एक बड़ी कविता की रचना होती दिखाई दी...

आज के समय के महत्वपूर्ण कवि इब्बार रब्बी ने बहुत रोचक तरीके से अपने खास अंदाज में कविताएँ पढीं. उनकी कविता के संदेश जितने तल्ख होते हैं, पाठ का अंदाज उतना ही सरल और मोहक. ‘मधुमेह’ और ‘भिखारियों का गीत’ शीर्षक कविताओं में आज के समय का जो विराट रूपक वे गढ़ते हैं, वह आज के सन्दर्भ में एक विकट रचना करता है. सत्ता किस तरह पूरे देश को पुरातनपंथ और पोंगापंथ की और ढकेल रही है और यह कितना खतरनाक हो सकता है, किस तरह नेता भिखारी की तरह दुनिया भर के देशों में मदद मांग रहे हैं और पूरे देश को पूंजी और कारपोरेट के हाथों गिरवी रख रहे हैं, वे अपनी कविता में रुपक के जरिये अत्यंत रोचक ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

पंकज चतुर्वेदी ने किसी को मौका नहीं दिया कि कोई पूछे कि पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है। उन्होंने अपनी राजनीति के रंग बिल्कुल साफ रखे। ‘शब्द में यकीन’, ‘इस बीच’, ‘नया राजपत्र’, ‘नया नियम’ समेत आधा दर्जन कविताओं में उनकी जन-पक्षधरता बिलकुल स्पष्ट और सीधे तौर पर दिखाई देती है।

सुशील शुक्ला की छोटी-छोटी कविताओं में गजब का संप्रेषण दिखा। नरेश जी ने भले ही परिचय कराते हुए बताया कि सुशील का यह पहला काव्यपाठ है, लेकिन सुशील जिस सधे हुए अंदाज से कविताएँ प्रस्तुत करते हैं वह उनकी छोटी-छोटी कविताओं के गम्भीर सन्देशों को अत्यंत सहजता लेकिन पैनेपन से सम्प्रेषित कर पाता है. ‘धूप निकलती है’, ‘जामुन खाये’ ऐसी ही कविताएँ हैं. नरेश सक्सेना के शब्दों में ‘कविता बनने की एक शर्त है कि उसमें कुछ नया हो’ तो सुशील की कविताओं का कथ्य और उनकी कहन की शैली दोनों ही इस पर खरे उतरते हैं।

युवा कवि रमणीक सिंह ने जम्मू और मुम्बई से जुड़े कई अनुभव अपनी कविता में दिखाये। कुछ कविताएं लम्बी होने के बावजूद महज स्मृति के आधार पर वे जिस सहजता से सुनाते हैं, वह प्रशंसनीय है. यह कोई कविता को जीने वाला इंसान ही कर सकता है।

स्मृति शेष- विजय नरेश
स्मृति शेष- विजय नरेश

इस संध्या की सबसे युवा हस्ताक्षर नेहा बहुगुणा बड़ी संभावना वाली रचनाकार के तौर पर सामने आईं. उन्होंने कविता के बजाय अपनी दो छोटी-छोटी कहानियां सुनायीं. कहानी तो क्या, एक स्त्री का आत्मकथ्य ज्यादा था यहाँ. उस वर्जित क्षेत्र में प्रवेश कराता हुआ, जो अभी तक तो आम नहीं है. ‘पहचान’ और ‘लाली देवी’ सात से आठ मिनट में खत्म होने वाली ऐसी ही छोटी-छोटी कहानियाँ हैं. नेहा ने जिस ‘अनगढ़ नाटकीयता’ से इस गद्य का पाठ प्रस्तुत किया वह किसी को भी बांधने को पर्याप्त था। कहानी को भी कविता की तरह पढ़ने का यह अंदाज सबको भाया. यहाँ स्त्रियों के लिए निषिद्ध क्षेत्रों के अतिक्रमण का साहस दिखा तो, ‘कपड़े देखकर लोगों को पहचानने’ के नये दौर की पोल-पट्टी खोलने का दुस्साहस भी.

कैफ़ी आजमी सभागार
कैफ़ी आजमी सभागार

काव्यपाठ के बाद युवा कवि एवं आलोचक अनिल त्रिपाठी एवं कवि पत्रकार सुभाष राय ने कविताओं पर अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत कीं। अनिल त्रिपाठी ने पढ़ी गई कविताओं के मर्म को उद्घाटित करने का बेहतर प्रयास किया तो, सुभाष राय का मानना था कि ये कविताएं इस बात का बयान हैं कि ये सभी कवि मिलकर मनुष्य की यातना के खिलाफ एक बड़ी कविता की रचना कर रहे हैं. इस समूचे समारोह को एकसूत्रता में बांधने और अपनी साफ-सुथरी एवं दो-टूक टिप्पणियों से समूची प्रस्तुति को जोड़ने का बड़ा काम किया प्रखर युवा आलोचक नलिनरंजन सिह ने। इस मौके पर शहर का लगभग समूचा बुद्धिजीवी, लेखक, कवि, चिंतक समुदाय मौजूद था। वरिष्ठ कथाकार रवींद्र वर्मा, वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति, वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव, लमही के संपादक विजय राय, उपन्यासकार वीरेंद्र सारंग, कवि लेखक कौशल किशोर, चर्चित किस्सागो हिमांशु वाजपेयी, कवयित्री विमल किशोर, कवयित्री सुशीला पुरी, सामाजिक कार्यकर्ता ताहिरा हसन, कथाकार शीला रोहेकर, कवि तरुण निशांत, वरिष्ठ पत्रकार दयाशंकर राय, वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी, वन्दना मिश्र और नागेंद्र के साथ ही राघव नरेश, सोनी राघव भी मौजूद थे.

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