बनारस से हुई थी छठ पूजा की शुरुआत, जुड़े हैं और भी कई ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तथ्य

आज से छठ पूजा शुरू हो रही है। छठ पूजा भले ही बिहार का राजकीय पर्व हो, मगर छठ की शुरुआत सबसे पहले बनारस में हुई थी। 11वीं शताब्दी में गहड़वाल वंश के राजाओं ने बनारस से सूर्य की पूजा शुरू की थी।
बनारस से हुई थी छठ पूजा की शुरुआत, जुड़े हैं और भी कई ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तथ्य

आज से छठ पूजा शुरू हो रही है। छठ पूजा भले ही बिहार का राजकीय पर्व हो, मगर छठ की शुरुआत सबसे पहले बनारस में हुई थी।

11वीं शताब्दी में गहड़वाल वंश के राजाओं ने बनारस से सूर्य की पूजा शुरू की थी। डाला छठ पूजा के इतिहास, विज्ञान और महत्व पर कई शोध प्रकाशित हो चुके हैं।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भूगोल विभाग के प्रोफेसर राणा पीबी सिंह के अनुसार काशी गहड़वालों की प्रमुख केंद्र थी। इन्हें सूर्य देव का घोर उपासक भी कहा जाता है।

गहड़वाल वंश से पहले सूर्य की पूजा भारत में ऋग्यवैदिक काल से हो रही है। ऋग्वेद में सूर्य की पूजा मां के रूप में की जाती है। वहीं, 9वीं शताब्दी में भी छठ पूजा का छिटपुट उल्लेख मिलता है।

मगर, काशीखंड के अनुसार बनारस के बाद छठ पूजा का चलन देश में बढ़ा। पानी में आधे कमर तक उतर कर आयुर्वेदिक पद्धति से, विज्ञान और व्रत का पालन करते हुए इस पूजा की विधिवत शुरुआत गहड़वाल वंश के राजाओं ने यहीं से किया। इसके बाद छठ पूजा आज तक जारी है।

प्रो. सिंह का कहना है कि इस बात कर समर्थन बनारस का सूरजकुंड भी करता है। यह कुंड वाराणसी के गोदौलिया-नई सड़क पर सनातन धर्म इंटर कॉलेज के पास स्थित है। शास्त्रों में उल्लेख है और शोधों में यह स्पष्ट हो चुका है कि इस कुंड में सूर्य का प्रकाश सबसे अधिक तीव्रता के साथ आता है।

कुंड के पास ही गोल चक्र में एक सूर्य मंदिर है। यहां पर हर रविवार को मेला लगता है, मगर छठ पूजा करने के लिए तो आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों तरह से यह देश का सबसे बेहतर स्थान है। यहां पर सूर्य की रोशनी में स्नान करने पर कुष्ठ रोग से भी राहत मिलती है।

कॉस्मॉस से बनी है काशी :-

प्रो. सिंह ने यह भी बताया कि काशी का नाम कॉस्मॉस से पड़ा है। इसका मतलब है सूरज की ओर से आने वाली प्रकाश की किरणें। उन्होंने बताया कि सूर्य की ओर से आने वाली किरणों का सबसे अधिक प्रभाव काशी में इसी समय देखा जाता है। इस समय पराबैंगनी किरणें हानिकारक नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद साबित होती हैं।

इस सीजन में प्रकाश की किरणों का घनत्व बढ़ जाता है। यह शरीर के लिए लाभकारी है। यदि ये किरणें पानी से टकराकर हमारे शरीर को स्पर्श करती हैं तो उनका प्रवाह शरीर में एनर्जी की तरह से होता है। यहां पर जल और सूर्य का मिलन होता है। अंजुल में जल लेकर सूर्य को देखते हैं तो उससे आंखों को लाभ पहुंचाने वाली किरणें ही मिलती। इस दिन हम सीधे सूर्य को नहीं देखते हैं।

सूर्य के 7 मंदिरों पर सबसे अधिक मैग्नेटिक फोर्स :-

भारत भर में सूर्य देव के मुख्य रूप से 7 मंदिर हैं। इनमें से 3 बिहार में स्थित हैं। ये मंदिर ऐसे ही नहीं बनाए गए बल्कि जिन स्थानों पर सूर्य की रोशनी से मैग्नेटिक फोर्स का असर ज्यादा रहा वहीं-वहीं पर ये मंदिर बनाए गए हैं।

प्राचीन ऋषियों ने इसे समझा और गढ़ दिया। यह बात प्रो. सिंह ने अपने रिसर्च में भी बताया है। उन्होंने कहा है कि यह त्योहार आयुर्वेद के सिद्धांतों पर भी खरा उतरता है। शास्त्रों के अनुसार अपभ्रंश और पाली शब्द इस त्योहार का कई बार वर्णन हुआ है, जहां पर प्राचीन आयुर्वेदिक औषधियों का ही जिक्र सबसे अधिक हुआ है।

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