जयपुर Lit Fest: पारदर्शी हो नए भारत की रिपोर्टिंग !
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जयपुर Lit Fest: पारदर्शी हो नए भारत की रिपोर्टिंग !

आख़िरी दिन डिग्गी पैलेस की 'बैठक' में 'रिपोर्टिंग द न्यू इण्डिया', सत्र के दौरान न सिर्फ़ मंच पर उपस्थित नामचीन पत्रकारों बल्कि सामने बैठे सैकड़ों दर्शकों ने इस सवाल का जवाब ढूँढने की कोशिश की।

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मौजूदा हालात में दुनिया भर की लगातार बदलती सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों और अपनी-अपनी वैश्विक छवि को लेकर पैदा हो चुकी चिन्ता के मद्देनज़र 'पत्रकारिता' की भूमिका बहुत अहम हो गयी है। विशेषकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता द्वारा किसी देश को कैसे प्रस्तुत किया जा रहा है, यह सवाल अपने आप में बहुत बड़ा हो गया है। 'ज़ी लिट्रेचर फ़ेस्टीवल 2020' के आख़िरी दिन डिग्गी पैलेस की 'बैठक' में 'रिपोर्टिंग द न्यू इण्डिया', सत्र के दौरान न सिर्फ़ मंच पर उपस्थित नामचीन पत्रकारों बल्कि सामने बैठे सैकड़ों दर्शकों ने एक साथ मिल कर भारत के संदर्भ में इस सवाल का जवाब ढूँढने की कोशिश की।

हम सब मानते हैं कि यह नया भारत है। एक ओर डिजिटल, कैशलेस, आधुनिकतम और विकास की ओर तेज़ी से बढ़ता हुआ, दूसरी ओर जुझारू, शिक्षित, निर्भय और अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए सचेत। इसी समय देश में बहुत कुछ ऐसा भी चल रहा है जो सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता है। सत्तर सालों में पहली बार कुछ नए अनुभव और उपलब्धियाँ हम भारतीयों के खाते में आ रही हैं। तो क्या हमारे पत्रकार भारत की यह नयी तस्वीर दिखा पाने में सक्षम हैं ? क्या हमारे राष्ट्रीय / अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार निष्पक्ष रह कर भारत की छवि निर्मित कर रहे हैं ? चर्चित पत्रकार और लेखिका राना अयूब का मानना है कि भारत को लेकर छवि निर्माण की प्रक्रिया काफ़ी हद तक पक्षपाती है।

जहाँ तक भारतीय पत्रकारों का प्रश्न है वो सही ख़बर को पीछे करते हुए सत्ता की ताकत से संचालित हो रहे हैं और ऐसा कुछ भी लिखने या दिखाने से बच रहे हैं जिससे एक दल विशेष की छवि ख़राब होती हो। उन्होंने विदेशी समाचार पत्रों और पत्रकारों को इस दृष्टि से ज़्यादा ईमानदार और पारदर्शी माना। कश्मीर के मौजूदा हालात का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि बाहर से पत्रकार कश्मीर पहुँचे और वहाँ के सही चित्र को अपने माध्यमों पर दिखाया लेकिन भारतीय पत्रकार या तो ऐसी हिम्मत नहीं दिखा सके या फिर उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया। बीबीसी न्यूज़, वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयार्क टाइम्स ने वहाँ की सही ख़बरें दुनिया तक पहुँचाई।

अमेरिकी पत्रकार और लेखक मैक्स रोडेनबैक के अनुसार भारत के पास दुनिया के बेहतरीन पत्रकार हैं। प्रतिभाशाली, जिज्ञासु और समाचार देने में दक्ष लेकिन वो कहीं न कहीं उद्देश्य से भटक से गये हैं। 'लाउड' हो कर अपनी बात रखने का तरीक़ा हमेशा कारगर नहीं होता, ना ही इस तरह हम ग़लत को सही साबित कर सकते हैं।

ब्रिटिश पत्रकार बी रॉलेट का कहना है कि पत्रकारिता को हमेशा उद्देश्यपूर्ण होना ही चाहिए। यह कोई साधारण काम नहीं है। बिना ज़रूरत के तेज़ आवाज़ और ख़राब शब्दों के प्रयोग से ख़बर अच्छी नहीं बनाई जा सकती, सच्ची तो बिलकुल नहीं। सबने एक स्वर से माना कि भारत में 1975 में आपातकाल के दौरान पत्रकारों पर प्रतिबन्ध लगाए गये थे लेकिनआज के हालात में बिना किसी घोषित आपातकाल के पत्रकारों के लिए बनायी जा रही प्रतिबन्ध की आचार संहिता किसी भी लोकतान्त्रिक देश के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकती। नए भारत की रिपोर्टिंग तभी पूर्ण मानी जायेगी जब यह सुन्दर होने के साथ ही निष्पक्ष और सच्ची भी हो। सत्र का सधा हुआ संचालन कर रहे थे लेखक और कॉलमिस्ट मिहिर एस. शर्मा।

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