कृष्ण बलदेव वैद
27 जुलाई, 1927 - 06 फरवरी 2020
कृष्ण बलदेव वैद 27 जुलाई, 1927 - 06 फरवरी 2020
आर्ट एंड कल्चर

कृष्ण बलदेव वैद उर्फ़ बिना कबीले वाला लेखक

स्मृति शेष/ कृष्ण बलदेव वैद.... असल में लेखन में जिसने भी वैद साहब को एक ढब का लेखक समझा उसने उनको कभी समझा ही नहीं। वैद साहब ने कभी अपना कोई क़बीला बनने ही नहीं दिया। विनम्र श्रृद्धांजलि...

प्रभात रंजन

प्रभात रंजन

कृष्ण बलदेव वैद के निधन के बाद मुझे सबसे पहले मनोहर श्याम जोशी याद आए। मनोहर श्याम जोशी का एक लेख हंस में छपा जिसमें उन्होंने किसी संदर्भ में अमेरिकी लेखक सौल बेलो के उपन्यास ‘हरजोग’ का नाम लिया था। जब लेख छप कर आया तो जोशी जी बड़े परेशान थे कि उन्होंने ग़लत संदर्भ में ग़लत उपन्यास का नाम ले लिया। उनको असल में सौल बेलो के एक अन्य उपन्यास ‘हयुबोलट्स गिफ़्ट’ का नाम लेना चाहिए था। गलती से वे उनके अतिप्रसिद्ध उपन्यास ‘हरजोग’ का नाम ले गए। वे बहुत परेशान थे कि अब इसको सुधार भी नहीं जा सकता।

मैंने कहा कि आप बेकार परेशान हैं। कौन समझेगा?

जोशी जी ने छूटते ही कहा, ‘अरे कृष्ण बलदेव वैद पढ़ेगा तो पकड़ लेगा इस गलती को।‘

सही में कुछ दिन बाद वैद साहब का फ़ोन आया। बोले, ‘जोशी, मैंने कई बार कहा है तुमको बोलकर मत लिखवाया करो। हो गई न गलती।‘ वैद साहब के गहरे ज्ञान से यह मेरा पहला परिचय था। यह बात सन 2000 के आसपास की है। मुझे याद है कि शायद अमेरिकी पत्रिका न्यूयोर्कर में उस समय अमेरिका के नए नए प्रसिद्ध हुए लेखक टीसी बोयले ने एक इंटरव्यू में न्यूयॉर्क स्टेट युनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक केबी वैद का नाम लिया था, जिन्होंने उनके लेखन को दिशा दी। जानता हूँ ये दोनों संदर्भ कृष्ण बलदेव वैद के लेखन को लेकर नहीं उनकी उस बौद्धिकता के बारे में है जिसके लिए वे भारत से अमेरिका तक विख्यात थे।

लेकिन वे लेखक हिंदी के ही थे। 1927 में पैदा हुए वैद साहब का पहला उपन्यास ‘उसका बचपन’ 1957 में प्रकाशित हुआ था और किशोर जीवन के अनुभवों को लेकर वह हिंदी की अलग से रेखांकित करने वाली किताबों में एक है। वैद साहब अपनी पीढ़ी के उन लेखकों में हैं जिन्होंने ख़ूब लिखा और हर बार अलग लिखा। वे हिंदी की मूल परम्परा से इतना अलग लिखते थे कि उनको किसी परम्परा में लोकेट नहीं किया जा सकता। और तो और वे अपनी परम्परा के लेखक भी नहीं थे। उनके अपने लेखन में भी इतने अधिक प्रयोग हैं कि उनको किसी इस या किसी उस का लेखक नहीं ठहराया जा सकता। मसलन ‘उसका बचपन’ के वैद और ‘गुजरा हुआ ज़माना’ के वैद या ‘मायालोक’ के वैद और ‘नर नारी’ के वैद एक नहीं लगते। वैद साहब ने दस उपन्यास लिखे हैं और उनके उपन्यासों में जैसे ही आप अमूर्तन के तत्व को रेखांकित करते हुए कोई सूत्र बनाने लगेंगे कि उनका उपन्यास ‘एक नौकरानी की डायरी’ ध्यान आ जाएगा जो यथार्थवादी शैली का एक रोचक उपन्यास है। या ‘बदचलन बीवियों का द्वीप’, जिसमें उन्होंने ‘कथासरित्सागर’ की अनेक कहानियों का पुनर्लेखन किया है। असल में लेखन में जिसने भी वैद साहब को एक ढब का लेखक समझा उसने उनको कभी समझा ही नहीं। वैद साहब ने अपना कोई क़बीला बनने ही नहीं दिया।

निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, रामकुमार, नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और ओम थानवी (तस्वीर ओम थानवी के फेसबुक वाल से
निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, रामकुमार, नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और ओम थानवी (तस्वीर ओम थानवी के फेसबुक वाल से
हिंदी के वे अकेले लेखक थे जो कुछ पाने के लिए नहीं लिख रहे थे। यह आश्चर्यजनक है कि हिंदी में इतना विपुल लेखन करने के बावजूद उनके खाते में ईनाम इकराम कम ही आए। उन्होंने दस उपन्यास लिखे लेकिन उपन्यासकारों की पाँत में उनको एक उपन्यास में निपटा दिया जाता है। तक़रीबन दो दर्जन कहानी संग्रह प्रकाशित हैं उनके, और उनकी पीढ़ी में उतनी कहानियाँ किसी और लेखक ने नहीं लिखी, लेकिन हिंदी के कथाकारों में उनका नाम उस तरह प्रमुखता से नहीं लिया जाता है जिस प्रमुखता से लिया जाना चाहिए।

आने वाले समय में उनको किन कृतियों के लिए याद किया जाएगा? यह सवाल ऐसा है जिसका एक जवाब उदय प्रकाश के फ़ेसबुक पोस्ट से मिला कि उनका उपन्यास ‘उसका बचपन’ क्लासिक श्रेणी का है। अपने बचपन को इस तरह से भी लिखा जा सकता है यह किसी ने सोचा भी नहीं था। मुझे उनका उपन्यास ‘मायालोक’ बार बार कौंधता है। वैद साहब कथा के नहीं कथाहीनता के सबसे जीवंत लेखक थे, मूर्त के नहीं अमूर्त छवियों के। ‘मायालोक’ उपन्यास में उनका यह अमूर्तन अपने श्रेष्ठ रूप में दिखाई देता है। एक ऐसे समय के बारे में जिसे तर्क से नहीं समझा जा सकता, जिसे कार्य-कारण से सिद्ध नहीं किया जा सकता उसके बारे में श्रेष्ठ कला अमूर्त ही हो सकती है। यह उपन्यास एक कोलाज है, अपने काल का अपने आने वाले काल का। एक प्रहसन है जिससे हम रोज़ गुजरते हैं लेकिन उसको समझ नहीं पाते, या तर्काधारित हमारी बुद्धि उसे समझ कर भी नहीं समझ पाती। इस बात की तरफ़ ध्यान नहीं दिया गया कि हिंदी में आधुनिकता की परम्परा की दीवार फाँद कर कूदने वाले वे पहले लेखक थे। अतीत के या वर्तमान नहीं भविष्य के लिए लिख रहे थे।

हिंदी के वे अकेले लेखक थे जो कुछ पाने के लिए नहीं लिख रहे थे। यह आश्चर्यजनक है कि हिंदी में इतना विपुल लेखन करने के बावजूद उनके खाते में ईनाम इकराम कम ही आए। उन्होंने दस उपन्यास लिखे लेकिन उपन्यासकारों की पाँत में उनको एक उपन्यास में निपटा दिया जाता है। तक़रीबन दो दर्जन कहानी संग्रह प्रकाशित हैं उनके, और उनकी पीढ़ी में उतनी कहानियाँ किसी और लेखक ने नहीं लिखी, लेकिन हिंदी के कथाकारों में उनका नाम उस तरह प्रमुखता से नहीं लिया जाता है जिस प्रमुखता से लिया जाना चाहिए। हालाँकि उनके नाटक मंचित हुए लेकिन छह नाटकों के बावजूद हिंदी के प्रमुख नाटककारों में उनका नाम नहीं आता। हिंदी आलोचना ऐसे टूल विकसित नहीं कर पाई जिससे उनका रचनात्मक मूल्यांकन किया जा सके। सवाल है वे किसके लिए लिख रहे थे? किस आस में लिख रहे थे? वे एक स्वप्न के लिए आजीवन लिखते रहे, जब तक शरीर ने साथ दिया लिखते रहे। वह स्वप्न था यथास्थिति से मुक्ति का, स्वतंत्रता का, मानवता का। हर लेखक की तरह वे भी अपने समाज की जकडबंदी से मुक्ति का स्वप्न देखते थे। बस उनका शिल्प भिन्न था। उस लेखक की बानगी सदा याद आती रहेगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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