शुभा मुद्गल
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आर्ट एंड कल्चर

Jaipur LitFest...रियलिटी शोज के बाद कलाकार का गुम जाना और कॉपीराइट गम्भीर मुद्दे: शुभा मुद्गल

जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल में आईं जानी-मानी शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल ने वेस्टलैण्ड अमेज़ॉन की सुधा सदानंद से बात करते हुए अपनी लेखन प्रक्रिया से लेकर कला, साहित्य और टेलीवजन शोज पर खुल कर चर्चा की

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जानी-मानी शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल अपनी गायकी की विविधता और करिश्मे के लिए जानी जाती हैं। एक ऐसी कलाकार जिन्होंने अपनी कला को न सिर्फ़ अपनी साधना बल्कि पूरा संसार बनाया। शास्त्रीय, उपशास्त्रीय ही नहीं बल्कि पाश्चात्य संगीत में भी उनकी महारत की दुनिया कायल है। उनकी आवाज़ को चाहने वाले सारी दुनिया में हैं और उन्हें सुनते नहीं अघाते। और अब शुभा मुद्गल एक नए अवतार के साथ अपने प्रशंसकों के सामने हैं - लेखिका शुभा मुद्गल।

'स्पीकिंग टाइगर्स' द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक 'लुकिंग फॉर मिस सरगम' इस समय पाठकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। शुभा मुद्गल एक संगीतकार के रूप में जितनी प्रभावशाली हैं, उनका लेखन भी उतना ही गहरा असर पैदा करता है। इस किताब की सारी कहानियाँ 'संगीत' विषय के इर्द-गिर्द घूमती हैं बल्कि संगीत के सुर-ताल के बीच ही बुनी गयी हैं। वजह बिलकुल साफ़ है। संगीत शुभा का अपना विषय है। उन्होंने पिछले तक़रीबन चालीस सालों में संगीत की दुनिया को बहुत करीब से देखा और पल-पल जिया है। उन्हें बख़ूबी मालूम है कि शोहरत तथा चकाचौंध से भरी इस दुनिया में सुर, लय, ताल के अलावा मंच के परे एक कलाकार की ज़िन्दगी में ख़ुशी, दुःख, अवसाद, निराशा, प्रतिस्पर्धा, जीत, हार और उपलब्धि बहुत कुछ होता है। 'लुकिंग फॉर मिस सरगम' की सारी कहानियाँ इन सारी परिस्थितियों के ताने-बाने से रची गयी हैं।

"जयपुर लिट्रेचर फ़ेस्टीवल" के दूसरे दिन वेस्टलैण्ड अमेज़ॉन की वरिष्ठ प्रबंधक सम्पादक सुधा सदानंद से परिसंवाद करते हुए शुभा मुद्गल ने अपनी लेखन प्रक्रिया और कहानियों पर खुल कर चर्चा की। अपनी कहानियों के विषय और किरदारों पर बात करते हुए शुभा ने चिरपरिचित मोहक मुस्कान बिखेरते हुए बताया कि सारे विषय संगीत से जुड़े थे इसलिए ज़्यादा खोजबीन नहीं करनी पड़ी। उनकी अलग-अलग कहानियों में उकेरे गए गायक, संगीतकार, संगीत व्यवसायी और जर्नलिस्ट फिक्शन तो ज़रूर हैं लेकिन हैं इसी समाज के। संगीत जगत की कड़ी प्रतिस्पर्धा और इससे उपजा रोष भी कहानियों के केन्द्र में हैं।

शुभा मुद्गल ने टेलीविजन पर आने वाले रियलिटी शोज के बारे में भी कई सवालों के खुलकर जवाब दिए. कहा कि इनका फार्मेट कुछ ऐसा है कि शो खत्म होने के तीन महीने बाद कलाकार कहां जाता है पता भी नहीं चलता। उसे अनुबंध में बांध दिया जाता है और वह अपने संगीत को बेहतर करने के लिए कुछ नहीं कर पाता। उन्होंने कहा कि हम संगीत को सिर्फ फिल्म संगीत के नजरिए से देखते हैं, जबकि संगीत हमारे देश के कोने-कोने में है।

शुभा मुद्गल ने कहा- सही है कि रियलिटी शोज ने हमें कुछ बेहतरीन प्रतिभाएं दी हैं, लेकिन इन्हें जिस तरह अनुबंध में बांध दिया जाता है और वे आगे कहां गुम हो जाते हैं, कुछ पता ही नहीं चलता। कॉपीराइट के विषय पर बोलीं, कि यह बहुत जटिल विषय है और हमें इसके बारे में कुछ बताया ही नहीं जाता। यदि हम कहीं से कोई गीत लेकर उसे अपने तरीके से भी गा रहे हैं तो भी हमें कम से कम यह तो बताना ही चाहिए कि यह मूल रूप से कहां से लिया गया है।

कॉपीराइट बहुत जटिल विषय है और सच है कि हमें इसके बारे में कुछ बताया ही नहीं जाता। यदि हम कहीं से कोई गीत लेकर उसे अपने तरीके से भी गा रहे हैं तो हमें कम से कम यह तो बताना ही होगा कि यह मूल रूप से कहां से लिया गया है। कॉपीराइट को हमारी संगीत की तालीम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। यह आज के समय बहुत जरूरी है - शुभा मुद्गल

शुभा मुद्गल ने इस बेहद ज़रूरी बात की ओर सबका ध्यान खींचा... अपनी एक कहानी की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए उन्होंने अफ़सोस जताया कि हमारे देश में एक कलाकार को कभी भी 'कॉपीराइट' एक्ट के बारे में कोई औपचारिक जानकारी नहीं दी जाती। इसी लिए अक्सर कलाकार या रचनाकार को 'क्रेडिट' देना एक ग़ैरज़रूरी काम मान लिया जाता है। ज़्यादा से ज़्यादा अपने गुरु या किसी बड़े संगीतकार की रचना गाते समय कान पर हाथ लगा कर उनका नाम बोल दिया जाता है। नाम न पता हो तो रचना को 'पारम्परिक' बता कर ज़िम्मेदारी पूरी की जाती है। जबकि कॉपीराइट के अनुसार मौलिक रचनाकर या गायक को पूरा 'क्रेडिट' मिलना ही चाहिए। ऐसे में कई बार अप्रिय स्थितियाँ भी सामने आती हैं।

"लुकिंग फ़ॉर मिस सरगम" की सारी कहानियाँ संगीत जगत की ऐसी ही तमाम परिस्थितियों के इर्दगिर्द बेहद रोचक ढंग से बुनी गयी हैं। अब तक शुभा मुद्गल की गायकी के करिश्मे से बंधे उनके प्रशंसक उनकी किताब को हाथोहाथ लेने को तैयार हैं और हों भी क्यों ना ? यह किताब दरअसल हर कलाकार और संगीतप्रेमी के मन को स्वर देती है।शुभा मुद्गल सहज भाव से स्वीकार किया कि किताब का शीर्षक 'मिस सरगम' की बजाय 'मिस्टर सरगम' भी हो सकता था। दरअसल यह उस हर व्यक्ति की कल्पना और अभिव्यक्ति है जो ख़ुद के लिए जीवन-संगीत की तलाश में है।

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