नंद किशोर आचार्य और हृषीकेश सुलभ
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आर्ट एंड कल्चर

भारत में आधुनिक रंगमंच के शलाका पुरुष हैं नेमिचन्द्र जैन: नंदकिशोर आचार्य

नेमिचंद जैन जन्मशती पर बिहार इप्टा द्वारा एएन सिन्हा सामाजिक शोध संस्थान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश भर के साहित्यकार, नाट्यकर्मी और रंगकर्मी जुटे और गम्भीर विमर्श हुआ

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"नेमीचंद जैन ने भारत के रंगमंच को नाट्य आलोचना की भाषा दी और नाट्य अभिनय को आयाम दिया। नेमिचन्द्र जैन के बहाने रंगमंच पर बात करने की कोशिश के अंतर्गत है रंगमंच वर्तमान स्थिति पर चर्चा हो। नेमी जी हिंदी रंगमंच ही नहीं बल्कि आज़ादी के बाद पूरे हिंदुस्तान के रंगमंच के शलाका पुरुष थे। नेमिजी ने कविता, आलोचना को भी एक नया आयाम दिया। उन्होंने भाषा की अनिवार्यता और अभिनय की सार्थकता को स्थापित किया। एक बेहतर भाषा के बनाए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता भी सार्थक अभिनय नहीं कर सकता है वैसे ही एक बेहतर अभिनय भाषा को जनता तक पहुंचाने के लिए जरूरी है। उन्होंने रंगमंच के परिभाषिक शब्दावली तैयार करने का ऐतिहासिक कार्य किया है वो भी 1966-67 के वर्ष में। रंगालोचना की भाषा का विकास नेमिजी को ही देन है।"

नेमीचंद जन्म शती पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरीय साहित्यकार प्रो० नंदकिशोर आचार्य ने उक्त बातें हैं।

बिहार इप्टा द्वारा ए एन सिन्हा सामाजिक शोध संस्थान के सभाकक्ष दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर देश भर साहित्यकारों, नाट्य कर्मियों और रंगकर्मियों का जुटान हुआ।

अपने उद्घाटन वक्तव्य में प्रो० आचार्य ने कहा कि नेमिचन्द्र जैन कविताओं के माध्यम से अपने दौर के युवाओं में लोकप्रिय हुए और प्रेरणा के स्रोत बने रहे। उपन्यास पर गहरी विवेचना को उन्होंने ना सिर्फ सामने रखा बल्कि "अधूरा साक्षात्कार" के माध्यम से उपन्यास आलोचना को नई दृष्टि दी। इप्टा के साथ जुड़कर काम करने और वामपंथी विचारधारा से उनके प्रेम ने सांस्कृतिक सरोकार को मज़बूत किया।

नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि नेमिजी रंगालोचना को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं से नेमीचंद जैन को पढ़ने, समझने का आह्वान किया।

नेमिचन्द्र जैन का एक रूप अनुवादक का भी है। नाटकों के साथ ही उन्होंने दर्शन का भी अद्वतीय अनुवाद किया। इक़बाल, श्री अरविन्द, टैगोर की कविताओं को उन्होंने दार्शनिक अनुवाद इस रूप में किया को एक मिसाल है। "मन की यात्राएं" उनका कलजयी अनुवाद है।

नेमिचन्द्र जैन ने हिन्दी के मौलिक नाटकों की निर्मिती पर जोर दिया। उनका मानना था कि सांस्कृतिक चित्त का निर्माण केवल अपनी ही भाषा से होता है। उनका हिंदी का आग्रह समाज को अपनी भाषा में आत्मसाक्षात्कार करने पर जोर देते थें। यहां तक उन्होंने हिंदी की अभिनय शैली की बात की। यह कोई संकीर्ण आग्रह नहीं बल्कि आत्मनिर्मिती की प्रक्रिया को सशक्त बनाए रखने थी।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पूर्व निदेशक कीर्ति जैन ने कहा कि नेमिचन्द्र की याद में इप्टा के द्वारा आयोजन उनके इप्टा आंदोलन के जुड़ाव के प्रति श्रद्धांजलि है। इप्टा से नेमिचन्द्र का जुड़ाव दिल से था और उससे जाना, समझा और जिया। अपने पिता के रूप में उन्होंने नेमिचन्द्र जैन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि मेरे मुस्लिम मित्र के साथ विवाह करने के निर्णय ने उनको तनिक भी विचलित नहीं किया। ना सिर्फ उन्होंने इस अंतरधार्मिक विवाह को सहमति भी बल्कि इसे मन से स्वीकार किया। स्त्री विमर्श को लेकर उन्होंने स्वयं में जिया और नारी मुक्ति की अवधारणा को अपने जीवन में शामिल किया।

अध्यक्षीय वक्तव्य के रूप में अपनी बात रखते हुए नाट्य आलोचक दीवान सिंह बजेल ने कहा कि नेमिचन्द्र जैन ने रंगमंच, कविता, उपन्न्यास और अनुवाद में परिपक्वता प्राप्त की और अपने सृजन कारण से एक नया वातावरण बनाने का कार्य किया। उन्होंने नाटक देखने की शास्त्रीयता को आमजन तक पहुंचने और दर्शकों को नाटक की आलोचना करने का स्पेकट्रम बनाते थे। दिल्ली की अखबारों में उनकी नाट्य समीक्षा बड़े चाव से नाटक करने वाले, देखने वाले और अख़बार पढ़ने वाले पढ़ते है। श्री दीवान ने नाट्य आलोचना की घटती परंपरा पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नाट्य आलोचना की महत्वपूर्ण भूमिका दर्शकों को नाटक तक लाना है। नाटक एक सजीव प्रस्तुति है और आलोचना इसे ज़िंदा बनाए रहता है।

अविनाश चन्द्र मिश्र, भारत रत्न भार्गव और ज्योतिष जोशी
अविनाश चन्द्र मिश्र, भारत रत्न भार्गव और ज्योतिष जोशी

नाटककार हृषिकेश सुलभ ने विषय प्रवेश करते हुए कहा कि नेमिजी ने देश के सांस्कृतिक माहौल की रूपरेखा बनाई और उसके कारण ही देश रंगमंच का उत्कर्ष हो सका है। नेमिजी ने बड़े कायदे से देशज रंगमंच को आधुनिक दृष्टि के साथ देखने और करने की अवधारणा को स्थापित किया। उन्होंने प्रयोग को रास्ता दिया और आगे बढ़ाए। उन्होंने कहा कि नेमिजी का पटना से बड़ा लगाव था और उन्होंने पटना के रंगकर्मियों से जीवंत संवाद रखा।

इस अवसर पर मोना झा, विनोद कुमार और पुंज प्रकाश ने नेमिचन्द्र जैन की कविताओं का पाठ किया। सीताराम सिंह के संगीत संयोजन में रूपा सिंह, श्वेत प्रीति और सिम्मी माला ने कविताओं पर आधारित दो गीतों की प्रस्तुति की।पहले दिन के कार्यक्रम के अंत में नेमिचन्द्र जैन के जीवन पर आधारित वृत्तचित्र "चिडी का पेड़" प्रदर्शित किया गया। वृत्तचित्र का निर्देशन किशन कालजयी और प्रकाश देवकुलिश ने किया। इस अवसर पर निर्देशकों ने रचना प्रक्रिया पर बात की।

राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर चित्र प्रदर्शनी आयोजित की गई। यह कल भी जारी रहेगी।कल सुबह 11 बजे से राष्ट्रीय संगोष्ठी के तहत "नेमिचन्द्र जैन की नाट्य दृष्टि" और " बिहार रंगमंच: लोक परम्परा और आधुनिक दृष्टि" विषय पर चर्चा होगी।

जावेद अख्तर खां, तरुण कुमार और ज्योतिष जोशी
जावेद अख्तर खां, तरुण कुमार और ज्योतिष जोशी

भिखारी ठाकुर से होती है बिहार में आधुनिक रंगमंच की शुरुआत: जावेद अख्तर खां

"भिखारी ठाकुर का बिदेशिया नाटक बिहार के रंगमंच की शुरुआत है। उसी प्रकार जैसे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को हिन्दी रंगमंच की शुरुआत माना जाता है। भिखारी ठाकुर के सारे नाटक महिलाओं को केन्द्र में रखकर मंचित हुए, जो अपने में महत्वपूर्ण योगदान है।" वरीय अभिनेता और हिन्दी के प्राध्यापक डॉ० जावेद अख्तर खां ने "नेमी स्मरण" तहत बिहार का रंगमंच" पर बीज वक्तव्य रखते हुए उक्त बातें कहीं।

बिहार इप्टा द्वारा नेमिचन्द्र जैन की जन्मशती के अवसर ए० एन० सिन्हा सामाजिक शोध संस्थान सभागार में दो सत्रों रंगमंच की दृष्टि और दशा दिशा पर गंभीर चर्चा हुई।

दूसरे सत्र में देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रदूषण की ओर ध्यान खींचते हुए डॉ० जावेद ने कहा कि हिंदी रंगमंच दिल्ली - केन्द्रित होता जा रहा है और हमारे रंगमंच के कर्ताधर्ता भी दिल्ली में केन्द्रित हिंदी रंगमंच को ही राष्ट्रीय रंगमंच बनाने के काम में जुटे हैं। नेमिचन्द्र जैन को दिल्ली केंद्रीय हिन्दी रंगमच को ही एक राष्ट्रीय रंगमंच के रूप में स्थापित करने की मुहिम चल पड़ेगी इसका अंदेशा हो गया था। आज हम यह आसानी से देख और समझ सकते हैं कि हिन्दी भाषा के दिल्ली केन्द्रित एक राष्ट्रीय रंगमंच को राष्ट्रवाद की बुनियाद को मज़बूत करनेवाला मानते हैं। नेमि जी इस तरह को राष्ट्रीयतावादी धारणा को हिन्दी रंगमंच के संदर्भ में अहितकर मानते थें। उन्होंने कहा कि जितनी भाषाएं हैं और क्षेत्र - जनपद हैं, उतने ही विविध रंगमंच हैं और इन्हें सुविधा के जातीय रंगमंच हैं। हिन्दी भाषी क्षेत्रों का भी कोई एक ही राष्ट्रीय रंगमंच बनाने पर जोर देना, सही रंगमंच को सामने आने ही नहीं देगा।

युवा रंग समीक्षक और नाट्य प्राध्यापक अमितेश कुमार ने कहा कि लोक और आधुनिक एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। एक लोक धर्मी आधुनिक हो सकता और एक आधुनिक लोक धर्मी भी हो सकता है। आधुनिक रंगमंच लोक धर्मी बनने का पूरा स्पेस रखता है। इसी कारण ब्रेख्त, लॉर्का के रूप में पाश्चात्य नाटककार और हबीब तनवीर, भिखारी ठाकुर के रूप में आधुनिक रंगमंच को देखना चाहिए। रंगमंच ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में थोड़ा भिन्न हो जाता है और स्थिति, काल, स्पेस के साथ दर्शकों के बीच जाता है। सबसे महत्वपूर्ण अभिनेता और दर्शक के बीच अनुभूतियों का सहज और सरल संबध है।

जिस प्रकार परंपरा को आधुनिकता की आवश्यकता होती है ताकि रूढ़ियों को हटाया जा सके, उसी प्रकार आधुनिकता को नवाचार करने के लिए परंपरा की आवश्यकता होती है। एक ओर शेष हिंदुस्तान में यह अवधारणा नब्बे का दशक आते आते खत्म हो जाता है वहीं बिहार में यह हृषिकेश सुलभ के 'अमली' और पटना इप्टा के नाटक 'सौदागर', 'दूर देश की कथा' (जावेद अख़्तर ख़ाँ) एवं 'मुक्ति पर्व' (अविनाश चंद्र मिश्र)के माध्यम से जारी रहता है। बेगूसराय में गंभीर रंगकर्म से जुड़े व दरभंगा विश्वविद्यालय के प्राध्यापक संतोष राणा ने अपने वक्तव्य में बिहार की लोक और आधुनिक रंगमंच पर अपनी बात रखी।

सत्र की अध्यक्षता पटना विश्वविद्यालय के प्राध्यापक व वरीय आलोचक प्रो० तरुण कुमार ने की।

राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले सत्र में "नेमिचन्द्र जैन की नाट्य दृष्टि" पर विमर्श किया गया। बीज वक्तव्य रखते हुए प्रख्यात नाटक अविनाश चन्द्र मिश्र ने कहा कि नेमिचन्द्र जैन निश्चय ही भारतीय रंगकर्म, विशेषकर हिन्दी रंगमंच की चिंता को लेकर आधी शताब्दी से अधिक समय तक विभिन्न रूपों में और मोर्चों पर सक्रिय रहने वाले गिने चुने व्यक्तियों में हैं। नेमिजी ने नाट्य चिंतन के जरिए हिन्दी रंगमंच के लिए सफलताओं और समृद्धि के जितने सिद्धांत सूत्र सौंपे हैं, उससे अधिक उनसे जुड़ी सतर्कता सौंपी है, जितना और जैसा नात्येतीहरा लिखा है, उससे अधिक इतिहास लेखन को सामग्री प्रस्तुत की है। संगोष्ठी को सत्यदेव त्रिपाठी और ज्योतिष जोशी ने भी संबोधित किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात आलोचक भारत रत्न भार्गव ने कहा कि शंभू मित्रा ने जब टैगोर के रक्तकर्बी को मंचित किया तो टैगोर एक बार फिर से हिन्दी रंगमंच में स्थापित हो गए। इसी प्रकार नेमिचन्द्र जैन ने पाश्चात्य नाटकों की हिंदी में अनुवाद का उनकी हिन्दी रंगमंच में स्वीकार्यता को फिर स्थापित किया। 'इडीपस' के हिंदी अनुवाद के मंचन के बाद नेमिजी ने सवाल रखा कि इडीपस का मंचन देखते हुए दर्शक ग्रीक त्रासदी को नहीं बल्कि उसको भारतीय संदर्भों में देखा। यही नेमिजी की विशेषता थी, वे भारतीय रंगमंच में सभी भाषाओं, संस्कृति के नाटकों को देखना चाहते थें। उनका आग्रह गंभीर और मौलिक काम करना ही था।

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में बड़ी संख्या में रंगकर्मी, रंगालोचक, शोधार्थी और युवा रंगकर्मी शामिल हुए। कीर्ति जैन, रश्मि वाजपेयी, तनवीर अख़्तर, फीरोज़ अशरफ खां, हृषीकेश सुलभ, विभा रानी, दीवान सिंह बजेली, योगेश, पुंज प्रकाश, मोना झा, विनोद कुमार, रविकांत, उदय कुमार, आदि मुख्य रूप से उपस्थित थें।

बिहार इप्टा के इस विशेष आयोजन के दौरान नेमिचन्द्र जैन के जीवन वृत्त को समर्पित चित्र प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। "नेमी छवि" शीर्षक से तैयार किए गए इस विशेष प्रदर्शनी में 16 स्टैंडी के माध्यम से नेमिचन्द्र जैन को कविता में अग्रदूत, आलोचना में उत्तरदाई नवाचार और रंगमंच में गंभीर चिंतक के रूप में प्रस्तुत किया गया। जीवन संगी, घर परिवार, इप्टा के दिन, कविता का एकांत, साहित्य, यारबाशी, रंगमंच, संगीत नाटक अकादमी व राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नटरंग, कृतियां और सम्मान शीर्षक से चित्र प्रदर्शनी को काफ़ी रोचक तरीके से प्रस्तुत किया गया।

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