Pitru Paksha 2021: पिंडदान और श्राद्ध करने गया में ही क्यों जाते है लोग, जानें क्या है रहस्य इसके पीछे

बिहार में स्थित गया ना केवल हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल है बल्कि बौद्ध धर्म की आस्था का भी प्रमुख स्थल है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए देश में कई जगह पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं ।
Pitru Paksha 2021: पिंडदान और श्राद्ध करने गया में ही क्यों जाते है लोग, जानें क्या है रहस्य इसके पीछे

बिहार में स्थित गया ना केवल हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल है बल्कि बौद्ध धर्म की आस्था का भी प्रमुख स्थल है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए देश में कई जगह पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं लेकिन गया में पिंडदान करना सबसे अधिक पुण्यदायी माना गया है और आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

इसलिए यहां देश ही नहीं विदेशों से भी लोग पितपृक्ष के दौरान आते हैं। मान्यता है कि यहां पर पिंडदान और तर्पण विधि करने से सात पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है।

गया बेहद ही रहस्यमयी जगह मानी जाती है, यहां हर जगह की अपनी कहानी है और उसका रहस्य है। आइए जानते हैं गया में श्राद्ध कर्म करने का आत्मा को किस तरह मुक्ति मिलती है और इसका रहस्य क्या है।

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पुराणों में है इसका जिक्र

गरुण पुराण में लिखा है कि जो व्यक्ति श्राद्ध कर्म करने के लिए गया के लिए जाता है, उसका एक-एक कदम पूर्वजों को स्वर्गारोहण के लिए सीढ़ी बनाता है। यहां पर श्राद्ध कर्म करने से पूर्वज सीधे स्वर्ग चले जाते हैं। क्योंकि यहां पर स्वंय भगवान विष्णु पितृ देवता के रूप में मौजूद होते हैं। इसलिए गया को पितृ तीर्थ स्थल भी कहा जाता है। इसकी चर्चा विष्णु पुराण और वायु पुराण में भी की गई है।

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फल्गु नदी

गया में रहस्यमयी फल्गु नदी भी है। जिसके बारे में कहा जाता है कि इस नदी का पानी धरती के अंदर से बहता है। यह नदी बिहार में गंगा नदी में मिलती है। इस नदी का वर्णन वायु पुराण में मिलता है। इस नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही पिंडदान करने वाला भी परमगति को प्राप्त होता है।

माता सीता के शाप के कारण यह नदी अन्य नदियों की तरह न बहकर धरती के अंदर बहती है, इसलिए इसे सलिला भी कहा जाता है। सबसे पहले फल्गु नदी में ब्रह्माजी और भगवान राम ने पिंडदान किया था। इसके बाद पांडवों ने भी इस नदी में श्राद्ध कर्म किया था।

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प्रेतत्माएं :-

गया के पास एक जगह स्थित है, जो प्रेतशिला के नाम से जानी जाती है। प्रेतशिला के बारे में कहा जाता है कि यहां पिंडदान करने से पूर्वज सीधे पिंड ग्रहण कर लेते हैं, जिससे उनको कष्टदायी योनियों में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती। प्रेतशिला के पास कई पत्थर हैं, जिनमें विशेष प्रकार के दरारें और छिद्र हैं।

कहा जाता है कि ये दरार और छिद्र लोक और परलोक के बीच कड़ी का काम करती हैं। इनमें से होकर प्रेतत्माएं आती हैं और पिंडदान का ग्रहण करती हैं। प्रेतशिला के पास एक वेदी भी है, जिस पर भगवान विष्णु के चरणों के चिन्ह भी हैं। इसके पीछे कथा यह है कि गयासुर की पीठ पर बड़ी सी शिला रखकर भगवान विष्‍णु स्‍वयं खड़े हो गए थे।

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गयासुर नाम राक्षस से है गया का संबंध

गया तीर्ख स्थल के नाम गयासुर नामक राक्षस से पड़ा है। पुराणों के अनुसार, भस्मासुर के वंश में एक गयासुर नामक राक्षस था। जिसने अपनी तपस्या से ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया था और एक वरदान मांगा था कि उसका शरीर भी देवताओं की तरह पवित्र हो जाए और दर्शन मात्र से सभी लोग पाप से मुक्त हो जाएं। ब्रह्माजी के वरदान से गयासुर के जो भी दर्शन करता वह पापों से मुक्त हो जाता और सीधे स्वर्ग पहुंच जाता।

इससे स्वर्ग के देवता परेशान हो गए क्योंकि वहां भीड़ बढ़ने लगी। इस समस्या से मुक्ति के लिए देवताओं ने गयासुर से पवित्र स्थल की मांग की। तब गयासुर ने अपनी पीठ पर यज्ञ करने की अनुमति दे दी। जब वह लेटा तब उसका शरीर पांच कोस तक फैल गया तब देवताओं ने यज्ञ करना शुरू कर दिया।

इससे देवताओं प्रसन्न होकर गयासुर को वरदान दिया की जो भी इस स्थान पर अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर्म और तर्पण करेगा, उसको मुक्ति मिल जाएगी। यज्ञ खत्म होने के बाद भगवान विष्णु ने उसकी पीठ पर बड़ी सी शिला रखकर स्वयं खड़े हो गए।

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हिंदुओं के अलावा बौद्ध धर्म के लोगों के लिए गया पवित्र स्थल है। बोधगया को भगवान बुद्ध की भूमि भी कहा जाता है। यहीं पर बोधि पेड़ के नीचे तपस्या कर भगवान गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, जिस्के बाद से वे बुद्ध के नाम से जाने गए। बौद्ध धर्म के अनुयाइयों ने अपनी शैली में यहां कई मंदिरों का निर्माण करवाया है। इसलिए इस जगह को ज्ञान स्थली भी कहा जाता है।

गया में भगवान राम ने माता सीता और लक्ष्मण के साथ राजा दशरथ का पिंडदान किया था, जिससे उनकी आत्मा को मुक्ति मिली थी। गया में रेत का भी पिंडदान किया जाता है। माता सीता ने फल्गु नदी के रेत का पिंड बनाकर दशरथजी को अर्पण किया था। दरअसल इसके पीछे कथा यह है कि जब भगवान राम इस जगह राजा दशरथ का पिंडदान करने पहुंचे थे तब वह सामग्री जुटाने के लिए अपने भाई के साथ नगर चले गए थे। उनको सामान जुटाने में बहुत देर हो गई थी और पिंडदान का समय निकलता जा रहा था।

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तब माता सीता नदी के तट पर बैठी हुई थीं, तभी दशरथजी ने उनको दर्शन देकर कहा कि पिंडदान का समय निकल रहा है इसलिए जल्दी मेरा पिंडदान करें। तब माता सीता ने रेत से पिंड बनाया और फल्गु नदी, अक्षय वट, एक ब्राह्मण, तुलसी और गाय को साक्षी मानकर उनका पिंडदान कर दिया।

जब भगवान राम पहुंचे तब उन्होंने सारी बात बताई और अक्षय वट ने भी इसकी जानकारी दी। लेकिन फल्गु नदी कुछ नहीं बोली तभी माता सीता ने नदीं को शाप दे दिया और अक्षय वट को वरदान दिया कि तुम हमेशा पूजनीय रहोगे और आज से पिंडदान के बाद तुम्हारी पूजा करने के बाद ही सफल होगी। इसके बाद भगवान राम और माता सीता और लक्ष्मण ने पिंडदान किया।

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