शक्तिपीठ मनसा देवी , जहाँ गिरा था देवी सती के मस्तिष्क का अग्र भाग

शक्तिपीठ मनसा देवी , जहाँ गिरा था देवी सती के मस्तिष्क का अग्र भाग

देवी के मस्तिष्क का अग्र भाग गिरने से मनसा देवी आदि शक्तिपीठ लाखों भक्तों के लिए पूजा स्थल बन गए। मुख्य मदिंर में माता की मूर्ति है। मूर्ति के आगे तीन पिंडियां हैं, ये तीनों पिंडियां महालक्ष्मी, मनसा देवी तथा सरस्वती देवी के नाम से जानी जाती हैं।

सतयुगी सिद्घ माता मनसा देवी के मंदिर में यदि कोई भक्त सच्चे मन से 40 दिन तक निरंतर पूजा करता है, तो माता उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करती है। माता मनसा देवी का चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों में मेला लगता है।

माता मनसा देवी के मंदिर को लेकर कई धारणाएं व मान्यताएं प्रचलित हैं। श्रीमाता मनसा देवी का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि अन्य सिद्घ शक्तिपीठों का। श्रीमाता मनसा देवी के प्रकट होने का उल्लेख शिव पुराण में मिलता है।

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पौराणिक कथा के अनुसार मनसा देवी मंदिर शक्ति पीठ मंदिरों मे से एक है। इस स्थान पर देवी सती के मस्तिष्क का अग्र भाग गिरा था। पूरे भारतवर्ष मे कुल 51 शक्तिपीठ है। जिन सभी की उत्पत्ति कथा एक ही है। यह सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुऐ है। धार्मिक ग्रंथ के अनुसार इन सभी स्थलो पर देवी के अंग गिरे थे। माता पार्वती हिमालय के राजा दक्ष की कन्या थी व अपने पति भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर उनका वास था। कहा जाता है कि एक बार शिव के ससुर राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया जिसमे उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, परन्तु शिव और सती को आमंत्रित नही किया क्योंकि वह शिव को अपने बराबर का नही समझते थे। इसके बावजूद भी पार्वती ने यज्ञ में शामिल होने की बहुत जिद्द की। महादेव ने कहा कि बिना बुलाए वहा जाना नहीं चाहिए और यह शिष्टाचार के विरुद्घ भी है। यह बात सती को काफी बुरी लगी और वह बिना बुलाए यज्ञ में पहुंच गयी। यज्ञ स्‍थल पर शिव का काफी अपमान किया गया जिसे सती सहन न कर सकी और वह हवन कुण्ड में कुद गयीं। जब भगवान शंकर को यह बात पता चली तो वह आए और सती के शरीर को हवन कुण्ड से निकाल कर तांडव करने लगे। जिस कारण सारे ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। पूरे ब्रह्माण्ड को इस संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से 51 भागो में बांट दिया जो अंग जहां पर गिरा वह शक्ति पीठ बन गया , और शिव ने कहा कि इन स्थानों पर भगवती शिव की भक्तिभाव से आराधना करने पर कुछ भी दुलर्भ नहीं होगा, क्योंकि उन-उन स्थानों पर देवी का साक्षात निवास रहेगा।
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देवी के मस्तिष्क का अग्र भाग गिरने से मनसा देवी आदि शक्तिपीठ देश के लाखों भक्तों के लिए पूजा स्थल बन गए हैं। मुख्य मदिंर में माता की मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के आगे तीन पिंडियां हैं, जिन्हें मां का रूप ही माना जाता है। ये तीनों पिंडियां महालक्ष्मी, मनसा देवी तथा सरस्वती देवी के नाम से जानी जाती हैं। मंदिर की परिक्रमा पर गणेश, हनुमान, द्वारपाल, वैष्णवी देवी, भैरव की मूर्तियां एवं शिवलिंग स्थापित है। हरियाणा सरकार ने मनसा देवी परिसर को 9 सितम्बर 1991 को माता मनसा देवी पूजा स्थल बोर्ड का गठन करके इसे अपने हाथ में ले लिया था।

श्री माता मनसा देवी की मान्यता के बारे पुरातन लिखित इतिहास तो उपलब्ध नहीं है, परंतु पिंजौर, सकेतड़ी एवं कालका क्षेत्र में पुरातत्ववेताओं की खोज से यहा जो प्राचीन चीजें मिली हैं, जो पाषाण युग से संबंधित हैं। उनसे यह सिद्घ होता है कि आदिकाल में भी इस क्षेत्र में मानव का निवास था और वे देवी-देवताओं की पूजा करते थे, जिससे यह मान्यता दृढ़ होती है कि उस समय इस स्थान पर माता मनसा देवी मंदिर विद्यमान था। मंदिर के पुजारी का कहना है कि यहां आने वाले भक्तों की हर मांग मां पूरी करती है।

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मंदिर तक आती थी 3 किमी लम्बी गुफा

कहा जाता है कि जिस जगह पर आज मां मनसा देवी का मंदिर है, यहां पर सती माता के मस्तक का आगे का हिस्सा गिरा था। मनसा देवी का मंदिर पहले मां सती के मंदिर के नाम से जाना जाता था। मान्यता है कि मनीमाजरा के राजा गोपालदास ने अपने किले से मंदिर तक एक गुफा बनाई हुई थी, जो लगभग 3 किलोमीटर लंबी है। वे रोज इसी गुफा से मां सती के दर्शन के लिए अपनी रानी के साथ जाते थे। जब तक राजा दर्शन नहीं नहीं करते थे, तब तक मंदिर के कपाट नहीं खुलते थे। 

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पौने दो सौ साल पहले राजा ने बनवाया था मंदिर

माता मनसा देवी का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि अन्य सिद्ध शक्तिपीठों का। माता मनसा देवी के सिद्ध शक्तिपीठ पर बने मदिंर का निर्माण मनीमाजरा के राजा गोपाल सिंह ने अपनी मनोकामना पूरी होने पर आज से लगभग पौने दो सौ साल पहले चार साल में अपनी देखरेख में सन‌ 1815 में पूर्ण करवाया था।

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