Shradh paksh 2021: 'पितृ सूक्तम' का पाठ करने से पितृ दोष से मिलती है मुक्ति, दूर होंगे दोष

पितृ पक्ष या पितरपख, 16 दिन की वह अवधि (पक्ष/पख) है जिसमें हिन्दू लोग अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और उनके लिये पिण्डदान करते हैं। इसे 'सोलह श्राद्ध', 'महालय पक्ष', 'अपर पक्ष' आदि नामों से भी जाना जाता है।
Shradh paksh 2021: 'पितृ सूक्तम' का पाठ करने से पितृ दोष से मिलती है मुक्ति, दूर होंगे दोष

पितृ पक्ष या पितरपख, 16 दिन की वह अवधि (पक्ष/पख) है जिसमें हिन्दू लोग अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और उनके लिये पिण्डदान करते हैं। इसे 'सोलह श्राद्ध', 'महालय पक्ष', 'अपर पक्ष' आदि नामों से भी जाना जाता है।

गीता जी के अध्याय ९ श्लोक २५ के अनुसार पितर पूजने वाले पितरों को, देेव पूजने वाले देवताओं को और परमात्मा को पूजने वाले परमात्मा को प्राप्त होते हैं अर्थात् मनुष्य को उसी की पूजा करने के लिए कहा है जिसे पाना चाहता है अर्थात समझदार इशारा समझ सकता है कि परमात्मा को पाना ही श्रेष्ठ है।

हिंदू धर्म अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष में पितृ पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने हिस्से का भाग अवश्य किसी ना किसी रूप में ग्रहण करते है। सभी पितृ इस समय अपने वंशजों के द्वार पर आकर अपने हिस्से का भोजन सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं। भोजन में जो भी खिलाया जाता है, वह पितृों तक पहुंच ही जाता है।

अपने स्वर्गवासी पूर्वजों की शांति व मोक्ष के लिए किया जाने वाला दान व कर्म ही श्राद्ध कहलाता है। जिसने हमें जीवन दिया। इस प्रकार तीन पीढ़ियों तक के लिए किया जाने वाला यज्ञ, पिंडदान और तर्पण ही श्राद्ध कर्म कहलाता है।

श्राद्ध के दिनों में दान-पुण्य किया जाता है और ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। कहते हैं कि ऐसा करने से पूर्वज खुश होते हैं औप आपको सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते है। इस बार पितृपक्ष 20 सितंबर से शुरू हुआ है जो कि 6 अक्टूबर तक रहेगा।

"पितृ-सूक्तम्"

"पितृ-सूक्तम्"। पितृ-सूक्तम् ।। उदिताम् अवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।असुम् यऽ ईयुर-वृका ॠतज्ञास्ते नो ऽवन्तु पितरो हवेषु॥अंगिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वनो भृगवः सोम्यासः।तेषां वयम् सुमतो यज्ञियानाम् अपि भद्रे सौमनसे स्याम्॥ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः।तेभिर यमः सरराणो हवीष्य उशन्न उशद्भिः प्रतिकामम् अत्तु॥त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठम् अनु नेषि पंथाम्।तव प्रणीती पितरो न देवेषु रत्नम् अभजन्त धीराः॥त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः।वन्वन् अवातः परिधीन् ऽरपोर्णु वीरेभिः अश्वैः मघवा भवा नः॥त्वं सोम पितृभिः संविदानो ऽनु द्यावा-पृथिवीऽ आ ततन्थ।तस्मै तऽ इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥बर्हिषदः पितरः ऊत्य-र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्।तऽ आगत अवसा शन्तमे नाथा नः शंयोर ऽरपो दधात॥आहं पितृन्त् सुविदत्रान् ऽअवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वः तऽ इहागमिष्ठाः॥उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।तऽ आ गमन्तु तऽ इह श्रुवन्तु अधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥आ यन्तु नः पितरः सोम्यासो ऽग्निष्वात्ताः पथिभि-र्देवयानैः।अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तो ऽधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सु-प्रणीतयः।अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्य-था रयिम् सर्व-वीरं दधातन॥येऽ अग्निष्वात्ता येऽ अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।तेभ्यः स्वराड-सुनीतिम् एताम् यथा-वशं तन्वं कल्पयाति॥अग्निष्वात्तान् ॠतुमतो हवामहे नाराशं-से सोमपीथं यऽ आशुः।ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥आच्या जानु दक्षिणतो निषद्य इमम् यज्ञम् अभि गृणीत विश्वे।मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरूषता कराम॥ आसीनासोऽ अरूणीनाम् उपस्थे रयिम् धत्त दाशुषे मर्त्याय।पुत्रेभ्यः पितरः तस्य वस्वः प्रयच्छत तऽ इह ऊर्जम् दधात॥ ॥ ॐ शांति: शांति:शांति:॥

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