Vastu Tips: घर में कहाँ होता है ब्रह्म स्थान और क्या होता है इसका महत्व, जानें ज्योतिषी की नजर से

Vastu Tips: घर में कहाँ होता है ब्रह्म स्थान और क्या होता है इसका महत्व, जानें ज्योतिषी की नजर से

वास्तुशास्त्र में घर के मध्य स्थान को ब्रह्मस्थान कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि भूमि या भवन के मध्य भाग में वास्तु पुरुष की नाभि होती है। यहां सभी दिशाएं आकर मिलती हैं और उस घर में इसी केंद्र स्थान से उर्जा का प्रवाह होता है।

वास्तुशास्त्र में घर के मध्य स्थान को ब्रह्मस्थान कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि भूमि या भवन के मध्य भाग में वास्तु पुरुष की नाभि होती है। यहां सभी दिशाएं आकर मिलती हैं और उस घर में इसी केंद्र स्थान से उर्जा का प्रवाह होता है।

जिस प्रकार हम भोजन करते हैं और वह पेट में जाकर शरीर के सभी अंगों को उर्जा प्रदान करता है। ठीक उसी प्रकार ब्रह्मस्थान से पूरे भवन में उर्जा संचारित होती है।

यदि ब्रह्मस्थान साफ-सुथरा दोषरहित है तो घर में सकारात्मक उर्जा का संचार होगा और उसमें रहने वाले लोग द्वेषरहित, क्रोधरहित, मानसिक तनाव से दूर रहेंगे और उनकी अच्छी तरक्की होगी।

लेकिन यदि ब्रह्मस्थान दोषपूर्ण है। यानी यहां वे वस्तुएं रखी गई हैं जिनसे वास्तु दोष उत्पन्न हो रहा है तो उस घर में रहने वाले लोगों को कोई न कोई परेशानी बनी रहेगी। उस परिवार के लोग मानसिक रूप से परेशान रहेंगे और बीमारियां उन्हें घेरे रहेंगी।

केवल घर ही नहीं बल्कि ऑफिस, फैक्टरी, दुकान आदि जगहों के लिए भी ब्रह्मस्थान उतना ही महत्वपूर्ण है। वास्तुशास्त्र में यह अनिवार्य नियम बनाया गया है कि भवन के ब्रह्मस्थान को खुला छोड़ देना चाहिए।

इस जगह पर कोई अनावश्यक वस्तुएं न रखें। कोई भारी सामान भी यहां न रखें। प्राचीनकाल में भवन के मध्य भाग को खुला छोड़ा जाता था और कमरे वगैरह उसके चारों ओर बनाए जाते थे। कई जगह मध्य स्थान में तुलसी का पौधा लगाया जाता है ताकि सकारात्मक उर्जा का प्रवाह निर्बाध रूप से होता रहे।

ब्रह्मस्थान से जुड़ा एक किस्सा महाभारत में भी आया है। कौरव-पांडवों के लिए जब नए राजभवन का निर्माण किया जा रहा था तो श्रीकृष्ण ने महल के मध्य में जानबूझकर एक कुएं का निर्माण करवा दिया था।

वे जानते थे कि इस महल में पांडवों को नहीं रहना है, यहां कौरव रहेंगे। ब्रह्मस्थान में कुएं के निर्माण से राजभवन में भयंकर वास्तु दोष उत्पन्न हुआ और उसके परिणामस्वरूप कौरव वंश का विनाश हो गया। महाभारत युद्ध में पांडवों की विजय के बाद श्रीकृष्ण ने उस कुएं को बंद करवा दिया था।

किसी भी भवन का निर्माण करने से पहले उसके ब्रह्मस्थान का ठीक-ठीक पता लगा लेना जरूरी है। जरा की गलती वास्तु दोष उत्पन्न कर सकती है। ब्रह्मस्थान का पता लगाने के लिए वास्तुशास्त्र में एक आसान विधि बताई गई है।

उसके अनुसार भूमि को पूर्व से पश्चिम की ओर आठ बराबर भागों में विभाजित करें। इसके बाद उत्तर से दक्षिण में आठ समान भागों में विभाजित करें। इस तरह पूरी भूमि 64 बराबर भागों में विभक्त हो जाएगी। इसके बाद सबसे मध्य के चार वर्ग को निशान लगा लें। यही ब्रह्मस्थान है।

ब्रह्मस्थान में क्या करें, क्या न करें...

  • ब्रह्मस्थान साक्षात वास्तु पुरुष की नाभि है। इसलिए इस स्थान को भूमि से आकाश तक खुला छोड़ देने का नियम है। बाकी कमरे इसके आसपास बनाए जाना चाहिए।

  • आज के समय में प्रायोगिक तौर पर ऐसा भवन बनाना संभव नहीं है। इसलिए मध्य भाग में घर का मुख्य हॉल, पूजा कक्ष बनाया जा सकता है।

  • टॉयलेट और बाथरूम ब्रह्मस्थान में भूलकर भी न बनाएं।

  • मध्य भाग में रसोईघर बनाने से उस घर में रहने वालों को कोई न कोई बीमारी चलती रहती है और बीमारियों पर अत्यधिक धन खर्च होता है।

  • घर के मध्य भाग में यदि सीढि़यां बना ली गई हैं तो इससे मानसिक परेशानी और आर्थिक तंगी बनी रहती है। ऐसे घर में रहने वाले व्यक्तियों का विकास रूक जाता है।

  • कई लोग घर बनवाते समय ध्यान नहीं रखते और पीलर, कॉलम, बीम लगा देते हैं। यह सबसे बड़ा वास्तु दोष पैदा करता है।

  • मध्य स्थान में बेडरूम नहीं होना चाहिए। मध्यस्थान में बेडरूम होने से रोग, अनिद्रा, दांपत्य जीवन में तनाव बना रहता है।

  • नवदंपती का रूम यदि घर के मध्य स्थान में है तो उनकी होने वाली संतानें अपंग पैदा होने का अंदेशा रहता है।

  • स्टोर रूम मध्य में नहीं बनाना चाहिए।

  • पूरे घर में सकारात्मक उर्जा का प्रवाह बनाए रखने के लिए मध्य स्थान में सुगंधित धूप, अगरबत्ती लगाएं।

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