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नज़रिया

कोरोना का कहर और जहाज की बिचली सीट का सफर

समझ में ये नहीं आ रहा कि दुनिया जहान में ‘सोशल डिस्टैंसिंग’ की दुहाई देकर, इसका सन्देश देते न थकने वाले आप अचानक हवाई जहाज में इसे कैसे और क्यों गोल कर गए? बसमें आपने ही नियम बनाया कि दो सीट वाली एक रो को एक सीट माना जाएगा और तीन वाली पर दो बैठेंगे।

नागेन्द्र

नागेन्द्र

इतने अंतर्विरोधों का अनुभव... नहीं शायद! कभी झेले नहीं! कभी भोगे नहीं! बिना झेले, बिना भोगे अनुभव होता भी भला कैसे।

खैर…

कई दिन से एक बात समझ में नहीं आ रही। आपने हवाई जहाज उड़ाने का तो फैसला तो कर लिया, लेकिन जहाज उड़ाने वालों को ही पहले भरोसे में लेने की जरूरत नहीं समझी। शायद मान लिया होगा कि वे तो इत्ते दिन से खाली ही बैठे हैं, सो चल ही पड़ेंगे। ठीक ही सोचा था आपने।

वो चल ही पड़े हैं...

गोया चलने को तैयार ही बैठे थे. बस, हाँके का इंतजार था. अब उनका ‘उड़न दस्ता’ कहां-कहां किस हाल में है, ये भी किसी ने नहीं सोचा. सोचने की जरूरत भी नहीं थी. सोचना हर किसी के लिए मुफीद भी नहीं होता (फिलहाल क्रू मेम्बर जल्दी जल्दी तय्यारी में लगे हैं).

आजकल तो सोचना और भी बुरा सोच है. सोचने से कुछ नहीं होता. सोचना एक नकारात्मक क्रिया है. और यह सिर्फ सवालों को जन्म देती है. और सवाल हमेशा ‘नकार’ लेकर ही आते हैं, सो सवाल अच्छे कैसे हो सकते हैं! सवाल तो नकारात्मक होते हैं! यानी नकारात्मक होना ही सवाल करना है! हमने फिलहाल इधर यही पढ़ा है...पढ़ाया गया है...

अरे, हम ये भी क्या ले बैठे. हम तो हवाई जहाज की उड़ान पर थे, सो वहीं चलते हैं...

अभी-अभी एक सर्कुलर देखा (नजर पहले ही पड़ गई थी, गौर से अभी देखा). सर्कुलर जो हवाई जहाज के यात्रियों के लिए बनाया गया है। इसमें बहुत कुछ लिखा है. वो सब लिखा है, जो हमारी सोच के दायरे से भी काफी दूर था. मतलब हम सोच भी नहीं पा रहे थे. यह भी लिखा है कि ऐसे पहुंचेंगे, वैसे पहुंचेंगे... फिजिकल चेक–इन नहीं करेंगे, मास्क-ग्लव्ज के बिना एंट्री नहीं होगी, 4 घंटे पहले पहुंचना होगा (अब शायद समय घटा दिया गया है), एंट्री के पहले थर्मल स्क्रीनिंग होगी, ऐसे गलीचे (वेट कार्पेट) से गुजरना होगा कि पहने हुये जूते-चप्पल तक खुद-ब-खुद ‘डिसइन्फेक्ट’ मतलब ‘कीटाणु मुक्त’ हो जायेंगे. वो वाली ट्राली नहीं मिलेगी, जिस पर एक बैग भी रखकर आप पूरी रंगबाजी से चल देते थे. कोरोना ने यह ‘रंगबाजी’ छीन ली है. कहीं भी न्यूज पेपर या मैगजीन के दर्शन भी नहीं होंगे, छूना तो दूर की बात है. यह सब यहाँ मोटा-मोटा और साफ़-साफ़ लिखा है. और भी बहुत कुछ लिखा है....यह भी लिखा है कि आपको/हमें वह सब लिखकर देना होगा, जो उन्हें बतायेगा/आश्वस्त करेगा कि हमें न सर्दी-जुखाम-बुखार है न हाल-फिलहाल आया था...7 सूत्रों में और भी बहुत कुछ है...

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और यह भी लिखा है कि... लेकिन इसमें यह कहीं नहीं लिखा है कि इस पूरी हवाई यात्रा में ‘सोशल डिस्टैंसिंग’ (हम इसे फिजिकल डिस्टैंसिंग कहना पसंद करते हैं) का पालन कैसे और किस तरह से होगा? दरअसल लॉकडाउन1.0 से लॉकडाउन 4.0 तक 60 दिनों के अब तक के पूरे दौर में यह सम्भवतः पहला सर्कुलर या गाइड लाइन या दिशानिर्देश है, जब ‘सोशल डिस्टैंसिंग’ शब्द का कहीं इस्तेमाल ही नहीं हुआ है। शायद...

अब मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि दुनिया जहान में ‘सोशल डिस्टैंसिंग’ की दुहाई देकर, इसका सन्देश देते न थकने वाले आप अचानक हवाई जहाज में इसे कैसे और क्यों गोल कर गए? बस में आपने ही नियम बनाया कि दो सीट वाली एक रो को एक ही सीट माना जाएगा और तीन वाली पर दो लोग बैठेंगे। यहां तक कि हजारों मजदूरों को ढोते वक़्त भी आपने इस बात का यानी उनकी सेहत का पूरा ख्याल रखा कि कहीं सांसों से सांसे न टकरा जाएं और कोरोना इधर से उधर हो जाये। हर सीट पर एक ही मजदूर बिठाया और इसका ढिंढोरा भी खूब बजाया कि हमें मजदूरों की, उनकी सेहत की कितनी फ़िक्र है. बाकी मामलों में मजदूरों का कितना ख्याल रखा, उसका हमें भी ख्याल है, आपको भी जरूर होगा!

ट्रेन में भी स्लीपर से लेकर एसी थ्री टियर तक में आपने मिडिल बर्थ की परम्परा फिलहाल कोरोना काल के लिए ही सही, खत्म करा दी, अच्छा किया.

दवा, किराना, पान, दर्जी, कपड़ा, परचून, किताब दुकान सभी जगह आपने सोशल डिस्टैंसिंग वाले ‘गोले’ का ख्याल रखा, अच्छी बात है.

यहां तक कि दारू की दुकान पर भी आपने ‘बेचारों’ को गोले में टिककर खड़ा होना सिखा दिया. वे खड़े भी हुए, भले ही हिलते डुलते.

मेट्रो अभी चली भले न हो, मार्किंग तो हो ही गई है। स्कूली बसें चली भले न हों, तय हो चुका है कि सीट में दूरी कैसे मेंटेन की जाएगी। यहां तक कि क्लास के लिए भी सोशल डिस्टैंसिंग के फार्मूले के तहत फिजिकल डिस्टैंसिंग मेंटेन करने का पूरा खाका बन चुका है। मछली-मटन-मुर्गे वाला भी बेचारा गोला बनाकर तय्यार खड़ा है। बारी जब भी आए...

घर की बाइक और कार को भी, लिफ्ट को भी आपने सोशल डिस्टैंसिंग सिखा दी कि बाइक पर एक, कार में कुल तीन ही बैठेंगे, और लिफ्ट में कैसे घुसना है, कैसे निकलना है यह भी बता ही दिया है, भले ही आरडब्ल्यूए (RWA) के माध्यम से.

अब ऐसे में चिंता तो स्वाभाविक है न कि आखिर हवाई जहाज के मामले में ये सोशल डिस्टैंसिंग का गोला बनाना आप क्यों भूल गए? पुरी साहब (नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी) से जब पूछा गया तो वो भी ये कहकर कन्नी काट गए कि बीच की सीट खाली छोड़ी तो इसका असर किराए पर पड़ेगा और यह जेब पर भारी पड़ेगा!

सच में बहुत अच्छा लगा कि आपको हमारी जेबों की इतनी चिंता है और कोरोना काल में जब चारों ओर से ‘जान’ के बाद इस ‘जेब’ पर ही सबसे ज्यादा हमले हो रहे हैं, तो आप हमारी जेब की इतनी चिंता है/कर रहे हैं। लेकिन यह सवाल अपनी जगह फिर भी बना हुआ है कि ‘कोरोना’ से बचने का खामियाजा ‘टिकट’ के चढ़े ही हुए दाम के रूप में कोई नागरिक क्यों भुगते. कोरोना काल में देश को बचाने के लिए अगर 60 दिन तक विमान यात्रायें बंद रह सकती हैं, तो लॉकडाउन खुलने के बाद कम से कम कुछ दिन के लिए ही सही, टिकटों के दाम पर तो लगाम लग ही सकता था! बीच वाली सीट कुछ शुरुआती दिनों के लिए ही सही, बिना बुक किये छोड़ी जा सकती थी. सरकार अपनी जिम्मेदारी और अपने नागरिक की सेहत के प्रति सचेत होने का एक अहसास तो करा ही सकती थी.

वैसे, मेरी चिन्ता कुछ और है. मैंने ये चिंता अब तक दबा रखी थी कि शायद पुरी साहब ट्वीट-श्वीट देख लें और इसका कोई तोड़ निकलना चाहें. लेकिन उन्होंने तो ट्वीट के बाद वाली प्रेस कांफ्रेंस में भी ‘जेब’ का हवाला देकर ‘जान’ की चिंता को दरकिनार कर दिया. वे भूल गये कि ‘जान है तो जहान है’ का स्लोगन आपने ही दिया था. हमें भी यही चिंता खाए जा रही है कि वो आपका ये स्लोगन कैसे भूल सकते हैं, और आप भी उन्हें इसकी याद क्यों नहीं दिला रहे हैं. अभी भारत में घरेलू उड़ान शुरू होने में दो दिन का वक्त है. क्या अब भी ऐसा कुछ नहीं हो सकता कि बीच वाली सीट खाली छोड़ दी जाए और सांसों को सांसों से टकराने से बचा लिया जाए. ऐसे वक्त में जब मल्टीप्लेक्स वाले सीट छोड़-छोड़ कर (ग्रुप यानी परिवार के हिसाब से) बुकिंग करने का प्रस्ताव दे रहे हैं, सारी शर्तों के साथ सिर्फ आधी सीट बुक करने को तैयार बैठे हैं, सीटों के बीच में ‘फ्लेक्सिबल ट्रांसपरेंट ग्लास पार्टीशन’ (टेम्परेरी) तक का सुझाव दे रहे हैं, हमें समझ में नहीं आ रहा कि यह आपकी समझ में क्यों नहीं आ रहा? क्यों नहीं याद आ रहा कि जान है तो जहान है!

या कि हमीं कुछ गलती कर बैठे हैं...हम ही भूल गये वो संशोधित स्लोगन जो कहता है ‘जान भी और जहान भी’... इस स्लोगन के कई और भी अर्थ हैं शायद. उस अर्थ से भी आगे के अर्थ, जो हम सीधे-सीधे देख पा रहे हैं.

बात सिर्फ इतनी सी भी नहीं. यह भी पहली बार है जब किसी भी आदेश में इतनी बार और इतने-इतने संशोधन दिखाई दे रहे हैं. एक-एक नियम पर एक से ज्यादा बार सफाई देनी पड़ रही है. सम्भव है बाकी के दो दिन में फिर कोई सफाई आये और हमें यह बताया जाए कि सरकार को हवाई जहाज की बिचली सीट पर कोरोना कहर दिख गया है और उसने इस कहर को फिलहाल लॉक करके बाक़ी की दोनों सीटों को जान बख्श दी है. हालाँकि अभी अभी खबर देखी है कि आपकी इन्ही सारी शर्तों के साथ इंडिगो और एयर इण्डिया की कई फ्लाइट पूरी पूरी फुल हो चुकी हैं. लेकिन मेरे जैसे ऐसे भी तमाम लोग भी हैं, जो इन हालात में कम से कम अभी तो उड़ान भरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे. वैसे आपने भी शायद बुजुर्गों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं को हवाई यात्रा से फिलहाल दूर रहने की ‘चेतावनी’ देकर अपनी जिम्मेदारी तो निभा ही दी है! इसके लिये आभार!

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