चितरंजन सिंह  
अब स्मृति शेष
चितरंजन सिंह अब स्मृति शेष
नज़रिया

नहीं रहे देश के जाने-माने मानवाधिकारवादी चिंतक चितरंजन सिंह

आपात काल के बाद उत्तर प्रदेश में जिन साथियों ने क्रांतिकारी वाम आंदोलन और क्रांतिकारी जनवाद की धारा को संगठित करने का कार्य किया, उनमें चितरंजन सिंह अग्रणी थे।

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देश के जाने-माने मानवाधिकारवादी चिंतक, वंचित, शोषित मेहनतकश आमजन के अधिकारों के संघर्ष के लिए प्रतिबद्ध सोशल एक्टिविस्ट और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष चितरंजन सिंह का शुक्रवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। बीते 18 जून को उनकी तबीयत अत्यधिक खराब होने पर उन्हें उनके गृहनगर बलिया में ही एक निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। वहां से 21 जून को चिकित्सक ने उन्हें वाराणसी के लिए रेफर किया था, लेकिन 22 जून को बीएचयू वाराणसी के चिकित्सक ने भी हालत देख उन्हें घर ले जाने की सलाह दी थी। तब से बलिया जिले के सुल्तानपुर गांव स्थित उनके पैतृक आवास पर उनका इलाज चल रहा था।

चितरंजन सिंह अपने पीछे छोटे भाई मनोरंजन सिंह (वरिष्ठ पत्रकार), उनके पुत्र प्रशांत रंजन, उत्सव रंजन और पुत्री श्रृंखला रंजन समेत भरापुरा परिवार छोड़ गए हैं। चितरंजन सिंह वर्तमान समय में पीयूसीएल (लोक स्वातंत्रय संगठन) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष थे।

चितरंजन सिंह के निधन की खबर फैलते ही सोशल मीडिया पर शोक संवेदनाओं का तांता लग गया. लगातार आ रही प्रतिक्रियायें उनकी लोकप्रियता का प्रमाण हैं.

एक जनयोद्धा का जाना: कौशल किशोर

वरिष्ठ रचनाकार और संस्कृतिकर्मी कौशल किशोर ने लिखा...चितरंजन भाई (चितरंजन सिंह) का जाना एक जनयोद्धा का जाना है। वे क्रांतिकारी वाम आंदोलन के साथ नागरिक अधिकार आंदोलन के भी साथी थे। पीयूसीएल के नेतृत्वकारी पदों पर रहकर नागरिक आंदोलन को आगे बढ़ाया। वे बलिया के रहने वाले थे। उनमें विद्रोही चेतना बहुत आरम्भ से रही।

मेरी पहली मुलाकात इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हालैंड हॉस्टल में एक बैठक में हुई थी। इस बैठक का आयोजन भाई रामजी राय ने किया था। उत्तर प्रदेश से जन आंदोलनों की एक पत्रिका ‘जनदिशा’ को निकालने को लेकर यह बैठक हुई थी। लखनऊ से अजय सिंह, अनिल सिन्हा के साथ मैं भी उसमें शामिल हुआ था। वहीं पहली बार चितरंजन भाई से मुलाकात हुई।

आपात स्थिति के बाद उत्तर प्रदेश में जिन साथियों ने क्रांतिकारी वाम आंदोलन और क्रांतिकारी जनवाद की धारा को संगठित करने का कार्य किया, उनमें चितरंजन भाई अग्रणी साथी थे। 1980-81 के दौर में उत्तर प्रदेश में जन आंदोलन की शक्तियों को संगठित करने के प्रयास में उत्तर प्रदेश संयुक्त जनमोर्चा का निर्माण हुआ। इस मोर्चे से लेकर इंडियन पीपुल्स फ्रन्ट के गठन में उनकी भूमिका थी। वे इसके पदाधिकारी भी रहे। जहां तक मुझे याद आ रहा है वे प्रदेश के कोषाध्यक्ष चुने गए थे। तमाम आंदोलनों, धरना, प्रदर्शन, गिरफ्तारी में वे शामिल रहे। बाद के दिनों में नागरिक अधिकार आंदोलन से जुड़े और पीयूसीएल के प्रदेश के संगठन सचिव और बाद में अध्यक्ष भी बने।

चितरंजन भाई आंदोलनों के लेखक भी थे। वे नियमित रूप से ‘शाने सहारा’ ‘अमृत प्रभात’ आदि अखबारों में लिखते थे। जब स्कूटर इंडिया के निजीकरण के खिलाफ आंदोलन चला, वे न सिर्फ इस आंदोलन से जुड़े बल्कि इस आंदोलन के बारे में उन्होंने ‘शाने सहारा’ में लिखा भी। इसी तरह डाला, चुर्क, चुनार के निजीकरण के खिलाफ संघर्ष से भी उनका जुड़ाव था।

बाद के दिनों में उनसे संपर्क टूट सा गया था। कभी-कभार फोन आता। वह साथीपन और आत्मीयता से भरा होता। अनिल सिन्हा के पटना में निधन के समय उनका फोन आया। साथियों की चिन्ता उन्हें रहती। जब अदम गोंडवी गंभीर रूप से बीमार हुए और लखनऊ के पीजीआई में भर्ती थे। उनका हालचाल लेने के लिए उन्होंने फोन किया और यह जानना चाहा कि इलाज के लिए क्या किया जा सकता है। उन्होंने अदम गोंडवी के अकाउंट में 10000 का सहयोग कराया। संभवत यह इंसाफ की ओर से सहयोग था।

चितरंजन सिंह जन आंदोलन के साथी रहे हैं। उनका जाना जनयोद्धा का जाना है। उनके निधन भावपूर्ण श्रद्धांजलि, सलाम, लाल सलाम !

Chitranjan Singh, Bodhisatva and Abha Bodhisatva
Chitranjan Singh, Bodhisatva and Abha Bodhisatva

एक संघर्ष का साथी और कम हुआ: बोधिसत्व

वरिष्ठ कवि और संस्कृतिकर्मी बोधिसत्व ने स्मरण करते हुए लिखा... ओह विदा चितरंजन भाई! जीवन की इतनी ही सीमा होती है।

चितरंजन भाई भी आज छोड़ गए। वे एक भव्य इलाहाबादी विभूति थे। हमारे लिए एक ज्वलंत वैचारिक ज्वाल! हालांकि मैं कभी भी उनके संगठन में नहीं रहा फिर भी उनका स्नेह सदैव मुझ पर भी रहा।

उनकी अनेक और मार्मिक यादें हैं। इलाहाबाद की सड़कों सभाओं में तो मिल ही जाते थे स्वराज भवन के गेट पर भी उनके साथ अल्प कालिक मुलाकातों का स्मरण हो रहा है।

1992 की बात है। मैं पटना में हृषीकेश सुलभ जी के बुलावे पर आकाशवाणी पटना के एक आयोजन में कविता पाठ कर रहा था। इस महा आयोजन में मैं पहला कवि था और विनोद कुमार शुक्ल जी अन्तिम। साथ में वीरेन दा और कई कवि थे।

मैंने पहली कविता पढ़ी तो भीड़ में से आवाज आई जिंदाबाद इलाहाबाद। सामने देखा तो चितरंजन भाई मेरा हौसला बढ़ाने के लिए "स्नेह गर्जना" कर रहे हैं। उस पर भी जो आश्चर्य हुआ वह यह कि उन्होंने कई कविताओं के नाम लेकर पढ़ने की फरमाइश कर दी।

मेरा पहला कविता संग्रह आया ही आया था। और यह तय था कि उन्होंने उसे पढ़ा था। क्योंकि कुछ कविताएं सीधे किताब में ही प्रकाशित हुई थीं और वे उनके नाम भी ले रहे थे। मुझे ठीक से याद है।

मैंने उनकी फरमाइश पर दो कविताएं पढ़ीं। उन्होंने उस शाम मुझमें एक ऐसा उत्साह संचार कर दिया उन्होंने जो उनके प्रति मुझे अनेक आदर और मान के भावों से भर देता है।

उनकी ऐसी उपेक्षा पूर्ण दारुण विदाई हमें अनेक स्तरों पर सोचने को विवश करती है।

उनसे अन्तिम मुलाकात वाराणसी से मुंबई की एक हवाई यात्रा में हुई। उस यात्रा में प्लेन के इंजन में शायद आग लग गई थी। भयानक कोलाहल में चितरंजन भाई हम चारों को हिम्मत दे रहे थे। आभा को और हमको बच्चो को सम्हालने की हिदायत देते वे बच्चो को सम्हालने में जुट गए थे। आसपास के लोग हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे लेकिन चितरंजन भाई तो हम लोगों के लिए साक्षात हनुमान बन कर मनोबल बढ़ा रहे थे। वे लगातार यह कहते रहे सब ठीक होगा, ठीक होगा। उनके कहे का भाव ऐसा था की जैसे कुछ न होगा। और सच बताऊं तो उनके साथ होने से ऐसा लग भी रहा था कि यह विमान सही सलामत जमीन पर उतरेगा।

हुआ भी ऐसा ही। हम दूसरे विमान से मुंबई आए। उस विमान की प्रतीक्षा में हम उनके साथ करीब चार घंटे बनारस हवाई अड्डे पर चर्चा करते रहे। उनमें एक सरल और उदात्त मनुष्य भावना संचारित थी। वे निरंतर मेरी छोटी सी बिटिया को सुविधाओं के खयाल में लगे रहे।

आगे उनसे लगभग दो साल पहले तक फोन पर बात होने की याद आ रही है। शायद कुछ और महीने हुए हों! उस क्षणिक आपदा में उनका व्यवहार नितांत सुलझे हुए वरिष्ठ का था। आगे वे आभा के और शायद में भी फेसबुक फ्रेंड हो गए थे। आभा को उनके देसी अपनापे की भावना ने बहुत आदर से भर दिया था। वह आदर भाव अभी भी हम सब में कायम है।

विदा चितरंजन भाई विदा।

एक संघर्ष का साथी और कम हुआ।

हम और अकेले हुए!

नमन आपको!

चितरंजन सिंह
चितरंजन सिंह

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