सुशांत की आत्महत्या के बहाने: दोस्त जरूरी हैं, लेकिन वैसे दोस्त के लिए हमारे जीवन में अब जगह ही कहां शेष है दोस्त!

सुशांत की आत्महत्या के बहाने: दोस्त जरूरी हैं, लेकिन वैसे दोस्त के लिए हमारे जीवन में अब जगह ही कहां शेष है दोस्त!

छोटे करियर में बड़ी लकीर खींचने वाले सुशांत बड़ा सवाल भी छोड़ गये! कहते हैं कि डिप्रेशन के शिकार इंसान को हमेशा किसी न किसी के सम्पर्क में रहना चाहिए. ये नहीं कहा जा रहा कि किसी न किसी को डिप्रेशन के शिकार उस इंसान के सम्पर्क में क्यों नहीं रहना चाहिए?

जितने वक़्त में बिहार, यूपी या देश के किसी भी हिस्से से ‘भागकर’ आये कलाकार मुम्बई में ‘इंटर्नशिप’ भी पूरी नहीं कर पाते, उतने दिन में उसने ‘एक्सीलेंस’ का तमगा भी हासिल कर लिया था. उसने परदे पर बहुत ऊंची पतंग भी उड़ाई और ताबड़तोड़ रन बनाने की किरकेटिया पारी भी खेल ली थी (जो वह असल जिन्दगी में चाहता था). एक दिन वह परदे पर डिप्रेशन से निकलने के तरीके बताता भी दिखा था, एक काउंसिलर की तरह. जिंदगी जीने का मकसद बताते हुए जीने का संदेश देता हुआ. उसने वह भी किया, जो वह वैचारिक रूप से चाहता था. उसने महज 6 साल के करियर में बहुत कुछ हासिल कर लिया था, जो आम तौर पर दुर्लभ या कहें आसान नहीं होता है. वह सुशांत सिंह राजपूत था.

पटना से निकलकर दिल्ली के रास्ते बहुत सुस्पष्ट और सुचिंतित राह बनाकर मुंबई पहुँचा था. वह सोचता था, संवेदनशील था, वह लक्ष्य लेकर चलने वाला जुझारू नौजवान था. उसने इंजीनियरिंग के बड़े इम्तहान AIEEE में देश में 7वीं रैंक हासिल की थी, जिसमें हर साल लाखों बच्चे शामिल होते हैं. लेकिन सपनों की उड़ान किसी और दिशा में ले जा रही थी, सो वह एक्टिंग की दुनिया में चला आया. यहाँ भी वह परफेक्शन की तलाश में रहता था. शायद इसीलिये धारावाहिक में काम मिलने और श्यामक डावर के डांसिंग ट्रुप में झंडे गाड़ने के बाद, श्यामक की ही सलाह पर मुंबई की ओर चला तो, लेकिन इससे पहले उसने रंगमंच दिग्गज बैरी जॉन को पकड़कर उनसे रंगमंच की, अभिनय की बारीकियों को पकड़ लेना जरूरी समझा. जो उसे करीब से जानते हैं, बताते हैं कि वह सोच-समझवाला, मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने वाला, संवेदनशील और जुझारू किस्म का नौजवान था. इतने सुलझे हुये, तेजी से ऊंचाई की ओर चढ़ रहे इस नौजवान ने आत्महत्या कर ली. आखिर क्यों?

ये शब्द लिखते वक़्त सुशांत के शरीर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ चुकी है, और उसने ‘फांसी के कारण दम घुटने’ यानी

आत्महत्या की ही पुष्टि की है. सुशांत की आत्महत्या ने एक बार फिर ऐसी घटनाओं के कारणों, इसके पीछे के हालात की पड़ताल, इसके मनोवैज्ञानिक पक्ष के साथ मित्रों-करीबियों की भूमिका पर बहस शुरू करा दी है. बहस कुछ दिन चलेगी, फिर शायद लोग सुशांत की आत्महत्या को भी भूल जायेंगे और यह सोचना भी कि कहीं हमारे-आपके आसपास भी तो कोई ऐसा ही ताना बाना नहीं बुन रहा.

यह सवाल ही गलत है कि...

सुशांत का एक दोस्त पटना में कह रहा है कि बचपन से उसे जानता हूँ, वो सुसाइड नहीं कर सकता! वो बहुत बोल्ड था!

एक दूसरा दोस्त जो मुम्बई में है, साथ काम भी कर चुका है, वो भी कह रहा है कि सुशांत सुसाइड कर लेंगे, ये विश्वास नहीं हो रहा!

कह तो हम सब भी यही रहे हैं...! सवाल है कि हमारे-आपके इस ‘विश्वास’ का आधार आखिर क्या है?

सुशांत के बारे में बताया गया है कि आत्महत्या के दो या तीन घंटे पहले उसने अपनी बहन से खुद फोन करके बात की थी. दस बजे के आसपास कमरे से निकला और फिर जूस लेकर अपने कमरे में चला गया. शायद पिता भी कह रहे थे कि उसने दो घंटे पहले फोन पर बात की थी (सम्भव है यह उसी कॉल के बारे में हो जो सुशांत ने बहन को की थी). और हम आप इसी आधार पर कह रहे हैं कि थोड़ी देर पहले यह सब करने वाला सुसाइड कैसे कर सकता है! वह इतना सामान्य कैसे रह सकता है!

एक बयान यह भी बराबर आता है (और मैं भी यह अक्सर कहता रहा हूँ) कि किसी को भी कम से कम कोई एक तो ऐसा दोस्त रखना ही चाहिये अपनी जिन्दगी में जिससे हम सब कुछ साफ़-साफ साझा कर सकें. लेकिन आज के हालात में क्या ये सब वाकई पहले जैसा ही ‘साफ़-साफ़’ रह गया है कि बातें इतनी ‘साफ़-साफ’ साझा हो सकें. भागदौड़ भरी जिन्दगी में एक-दूसरे के साथ बीतने वाली सुबह और शामें ही जब न बची हों, रिश्तों की परिभाषा बदल गई हों, ये सवाल बेमानी और रूढ़ हो चुका है.

तो यहाँ मैं कहना चाहूँगा और हमें मान लेना चाहिए कि ऐसा कहने और मानने वाले हम-सब गलत हैं! हम या तो भावनाओं में बह रहे हैं या फिर सच्चाई में झांकना नहीं चाहते! हम यह सब करते-कहते हुए भी यह देखना फिर भूल जा रहे कि कहीं फिर तो कोई नहीं है, हमारे इर्द-गिर्द हमारा कोई ख़ास, जो ऐसा कोई ताना-बाना बुन रहा हो, और हम उसमें झांक ही न पा रहे हों, सुबह-शाम ‘बात’ होने के बावजूद! यह एक कटु सत्य है और हमारे इसी गढ़े हुए कृतिम समाज का है, जिसमें सच में हमारे पास किसी के लिए वक्त नहीं बचा है.

राजेश शर्मा की वह मौत मुझे कभी नहीं भूलती, क्योंकि वह एक सुचिंतित और सोची-समझी मृत्यु थी... खुद तय की गई... खुद से आमंत्रित... बहुत सलीके से. बाद में जो बातें सामने आईं तब समझ में आया कि राजेश जी तो ये प्लान सम्भवतः एक साल से कर रहे थे... और घर से दफ्तर और कॉफ़ी हॉउस के मित्रों तक (जहाँ वे रोज बैठते लेकिन कुछ दिनों से शायद नहीं जा रहे थे) किसी को अहसास भी नहीं हुआ...तब भी लोगों ने यही कहा था कि ‘राजेश जी से तो ऐसी उम्मीद नहीं थी’.

हर सुसाइड के बाद याद आता है वह सुसाइड !

हर सुसाइड के बाद जब यह या ऎसी बहस शुरू होती है, मुझे 1997-98 की लखनऊ की वह घटना याद आती है, जिसने हम सबको दहला दिया था. उस दौर के चर्चित कवि और उत्तर प्रदेश सूचना विभाग में संयुक्त निदेशक राजेश शर्मा ने शहर की एकमात्र इतनी ऊंची इमारत की 12वीं मंजिल से कूदकर अपना जीवन समाप्त कर लिया था. यह उस दिन (शायद 4 मार्च) सुबह 10 से 11 बजे की बीच की बात है. लोगों ने तब भी कहा था कि राजेश जी से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी. राजेश शर्मा भी कुछ दिनों से अवसाद में थे, ये उनके मित्रों और परिवार यानी हम सब से छिपा नहीं था...

खैर, यहाँ बात सिर्फ इतनी ही नहीं है. खास बात ये हैं कि राजेश शर्मा ने उस दिन सुबह दिल्ली से आये एक लेखक-पत्रकार मित्र से ‘अच्छी खासी सामान्य’ बात की थी. घर में सो कर उठे, सब कुछ सामान्य था. चाय-नाश्ता, दफ्तर निकलने से पूर्व खाना, यानी वह सब किया जो रोज करते थे. पत्नी से यह भी वादा किया कि ड्राईवर के हाथों टूथपेस्ट और कुछ और सामान (जो शायद कई दिन से भूल जा रहे थे) भेज देंगे.

समय के पाबन्द राजेश शर्मा उस दिन भी बिलकुल ठीक वक्त पर दफ्तर पहुंचे थे. स्वभाव से गम्भीर लेकिन जूनियर, खासकर चतुर्थ श्रेणी स्टाफ से बड़े प्रेम से बतियाने वाले राजेश शर्मा ने उस दिन भी अपने ड्राईवर, दफ्तर के चपरासी और गार्ड सभी से हालचाल पूछा था. अपने ड्राईवर को वादे के अनुरूप रास्ते में खरीदा गया समान लेकर बंद लिफाफे में एक चिट्ठी के साथ घर वापस रवाना कर दिया था. इसके बाद वो दूसरे ड्राईवर को लेकर हुसैनगंज की ओसीआर बिल्डिंग चले गये थे, जहाँ वो कभी सपरिवार रह चुके थे. जीप से उतर कर बिल्डिंग में गये और ड्राईवर को वापस जाने को बोल दिया. वापसी की राह में परिचितों से गपशप में मशगूल ड्राईवर अभी जीप स्टार्ट भी नहीं कर पाया था, कि बिल्डिंग से कोई कूदा था. कोई जान चली गई थी. भीड़ की तरह ड्राईवर भी दौड़कर देखने पहुंचा था. जो गिरा था, लहूलुहान पड़ा था, वह राजेश शर्मा थे. चंद मिनट पहले तक मुस्कराते हुए अपने स्टाफ का हालचाल लेने वाले राजेश शर्मा जा चुके थे...

खैर, छानबीन शुरु हुई तो पता चला कि घर पर पहुंची चिट्ठी और दफ्तर में छोड़ी गई चिट्ठी लगभग एक साथ पढ़ी गईं थीं और जब तक लोग सम्भलते या उनके पीछे दौड़ते, राजेश जा चुके थे. दोनों चिट्ठियां लाल पेन से लिखी गई थीं, समान मजमून के साथ. एक तीसरी और बिलकुल समान चिट्ठी उन्होंने अपनी जेब में भी रख ली थी. वे कार्बन का भी इस्तमाल कर सकते थे लेकिन परफेक्शनिस्ट राजेश शर्मा ने एक ही मजमून तीन बार लिखना पसंद किया था. समय के पाबन्द और हमेशा एक खास अंदाज में घड़ी देखकर जवाब देने वाले राजेश शर्मा ने गजब की टाइमिंग और अनुशासन मेंटेन किया था... कम से कम मैंने तो स्कूटर पर पीछे बैठे कथाकार मित्र अखिलेश से उस दिन यही कहा था (ठीक एक माह पहले कही गई उनकी बात याद करते हुये).

राजेश जी की टाइमिंग और प्लानिंग की एक और बानगी है... इस घटना के ठीक एक माह पहले उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल की पत्नी का निधन हुआ था. हम सब शवदाह गृह भैंसाकुंड में थे. किनारे गुमसुम से खड़े राजेश जी से वहां बहुत दिन बाद मुलाकात हुई थी. मैंने बात छेड़ते हुए उनसे किसी दिन मिलने-कुछ बात करने की इच्छा जताई...

राजेश जी ने पहले अपने अंदाज में मुस्कराकर टाला, फिर बड़े अंदाज से घड़ी देखी और बोले, ‘ठीक है, एक महीने बाद मिलते हैं’.

मैंने तब इसे राजेश शर्मा का ‘दम्भी और सिनिकल’ स्टेटमेंट माना था. उसी वक्त वहां मौजूद कई कामन मित्रों-साहित्यकारों से यह चर्चा भी की थी... किसी ने चिंता के साथ तो कुछ ने मुस्करा कर यह कहके टाल दिया था कि ‘आजकल वो इसी तरह बातें करते हैं’... राजेश शर्मा ने खुद की मृत्यु के लिए तो तारीख मुकरर्र कर रखी थी, वह उस दिन से ठीक एक माह बाद की थी (यह बाद में समझ में आया), जिस दिन उन्होंने मुझसे मिलने की बात कही थी, या मेरा उपहास उड़ाया था...कि चलो मिलते हैं दोस्त...!

राजेश शर्मा की वह मौत मुझे कभी नहीं भूलती, क्योंकि वह एक सुचिंतित और सोची-समझी मृत्यु थी... खुद तय की गई... खुद से आमंत्रित... बहुत सलीके से. बाद में जो बातें सामने आईं तब समझ में आया कि राजेश जी तो ये प्लान सम्भवतः एक साल से कर रहे थे... और घर से दफ्तर और कॉफ़ी हॉउस के मित्रों तक (जहाँ वे रोज बैठते लेकिन कुछ दिनों से शायद नहीं जा रहे थे) किसी को अहसास भी नहीं हुआ.

तब भी लोगों ने यही कहा था कि ‘राजेश जी से तो ऐसी उम्मीद नहीं थी’.

यह सब इस वक्त याद आना इसलिए भी स्वाभाविक है कि सुशांत सिंह के सुसाइड के बाद भी हर शख्स यही कह रहा है कि सुशांत ऐसा नहीं कर सकते. दो घंटे पहले बात करने, या जूस लेकर कमरे में जाने वाला शख्स ऐसा कैसे कर सकता है! सुशांत तो बहुत बहादुर थे... गोया आत्महत्या कोई छोटी मोटी चीज हो जिसे यूं ही, कभी भी अंजाम दिया जा सकता हो. नहीं, आत्महत्या कोई जिगरेवाला ही कर सकता, कायर नहीं. यह बहुत हिम्मत का काम है... इसलिये आत्महत्या को सिर्फ एक ही नजरिये से देखना बंद कीजिये. कभी उस मानसकिता में जाकर देखिये, ऊंचाई से झाँकना ही जब दुस्साहसिक लगे, इंसान पंखे की उंचाई और हुक की मजबूती तक की तजबीज कर वहां तक पहुंचे, वह कमजोर तो नहीं ही होगा. ऐसे लोगों को कायर कहने वाले मुझे अच्छे नहीं लगते, क्योंकि मुझे हमेशा लगता रहा है कि यह काम कोई अत्यंत संवेदनशील इंसान ही कर सकता है, कोई कायर इंसान नहीं (हालाँकि यह बहस खासा विस्तार मांगती है, तमाम तरह की सहमतियों-असहमतियों के साथ).

यह सब लिखने के पीछे मेरा आशय किसी भी तरह की आत्महत्या को महिमामंडित करना नहीं, सिर्फ यह भाव विकसित करना है कि हमें एक बार फिर थोड़ा ठहरकर सोचना होगा. झांकना होगा अपने घर, दोस्तों और आसपास में, कि क्या वाकई वहां सब कुछ सामान्य है, या सब कुछ सामान्य दिखते हुए भी कहीं कुछ असामान्य तलाशने की दृष्टि विकसित करनी होगी. ऐसी दृष्टि जो रोज बात करते हुए भी सच को नहीं पकड़ पा रही के आगे जा सके. एक ऐसी दृष्टि जो सिर्फ वही न देखे, जो उसे दिखाया जाता है. एक ऐसी संवेदनशील दृष्टि जो ‘हमीं-हम ठोस’ के प्रचलित जुमले से आगे सोचने-देखने का नजरिया देती है.

वरना तो सिनेमा के पर्दे पर खुद के बेटे को डिप्रेशन से बचाने की जद्दोजहद करने वाला (‘छिछोरे’ का सुशांत), रन बनाने के धुनी, धौनी जैसा जुझारू (‘धौनी’ का सुशांत) और उत्साह के साथ दूर तक पतंग के पेंच लड़ाने वाला (‘काई पो छे’ का सुशांत) एक जुझारू और बहादुर शक्स इसी तरह हमारे हाथ से निकलता रहेगा और हम जुमलों की लकीर पीटते रहेंगे. वो पर्दे पर इस सवाल का मुस्करा कर जवाब भले दे ले कि ‘ये तेरी जिन्दगी में क्या सब चल रहा है...?’ लेकिन हम असल जिन्दगी में उससे यह जवाब पाना तो दूर, सवाल करना तक भूल जायेंगे.

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