Delhi in lockdown
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नज़रिया

कोरोना आपदा में सख्ती जरूरी है, लेकिन कोई खिड़की तो इस 'दीवार' में भी खुलनी ही चाहिये

इस कठिन दौर में कठिन इंतजामों के बीच कुछ स्पेस निकालने की जरूरत तो है. कोविड-19 संक्रमण की इस डरावनी चेन को तोड़ना ही होगा. यह लॉकडाउन के बिना सम्भव नहीं है. इस पर किसी को आपत्ति हो भी कैसे सकती है...

नागेन्द्र

नागेन्द्र

वाराणसी-गोरखपुर की कुछ लड़कियाँ लखनऊ में काम करती हैं. पीजी हॉस्टल में रहती है. जनता कर्फ्यू और लॉकडाउन के पहले दौर तक सो सब ठीक था. ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रही थीं. पढ़ाई करने वाली कई बच्चियां तो कालेज बंद होने के कारण घर चली गईं. कुछ शुरूआती लॉकडाउन में ‘वर्क फॉर्म होम’ की सुविधा के साथ यहीं रह गईं. अब 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा होने और कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए पीजी वालों ने उन्हें घर जाने को कह दिया है. वे नाश्ता-खाना दे तो रहे हैं, लेकिन अब आनाकानी भी हो रही है. कुल मिलाकर इन्हें जैसे भी घर चले जाने का संकेत है. दोस्त और परिवार के लोग इन्हें वापस घर ले जाने का इंतजाम कर रहे हैं. कुछ ने अपने स्थानीय रिश्तेदारों की मदद ली है. अब इसमें पीजी वालों को भी आखिर कितना और कैसे दोष दिया जाए! स्वाभाविक है ‘संक्रमण-संकट’ के इस दौर में वे भी कोई जोखिम क्यों उठाना चाहेंगे! वो ऐसी किसी लड़की की लम्बे समय तक जिम्मेदारी क्यों और कैसे लेना चाहेंगे? दोनों पक्षों की समस्या बहुत जेनुइन है.

इलाहाबाद से जाकर गाजियाबाद में फंस गया परिवार

इलाहाबाद के एक मित्र किसी पारिवारिक आयोजन में एक हफ्ते पहले गाजियाबाद गये थे. इसी दौरान पहले ‘जनता कर्फ्यू’ का सामना करना पड़ा. उससे वे खुश भी थे. लगा, वक्त की जरूरत है और ऐसे नाजुक अवसरों पर ऐसे संदेश इसी तरह दिए भी जा सकते हैं. खुद भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. शाम पांच बजे घंटा भी बजाया, शंख भी. लेकिन शाम होते-होते पहले कुछ घंटे और फिर कुछ दिन के लिए जनता कर्फ्यू का एक्स्टेंशन, और दो दिन बाद ही पूरे देश में 21 दिन का लॉकडाउन... बेचारे पत्नी और बेटी के साथ गाजियाबाद में बेटे की ससुराल में फंसे हुए हैं. कोई रास्ता वापसी का नहीं दिख रहा. कोई सुनने वाला नहीं मिल रहा. सब यही कह कर टाल दे रहे हैं कि बहुत सख्ती है. ये अकेले शख्स नहीं हैं. ऐसे तमाम लोग हैं, जो किसी कार्यवश बाहर गये और अब जहाँ-तहां फंस गये हैं.

स्वाभाविक है ये इक्का-दुक्का मामले नहीं हैं. ऐसे मामले तमाम हैं. इतनी बड़ी संख्या में देश भर में चल रहे पीजी होस्टल्स का ही जायजा लिया जाए तो तमाम ऐसे सच सामने आयेंगे. कितने ही लोग हैं, जो स्टडीज के लिए या किसी अन्य काम के लिए दूसरे शहरों में थे. यह होली बाद का दौर है, सो रिजर्वेशन न मिलने से नहीं लौट पाए. अब न ट्रेन है न फ्लाइट. जहाँ-तहां फंसे हैं.

Patna in lockdown
Patna in lockdown

पटना से जाकर, बेंगलुरू में अटके ...

लेखक, उपन्यासकार, नाटककार हृषीकेश सुलभ (Hrishikesh sulabh) पटना के हैं. 7 मार्च की सुबह पत्नी के साथ बेंगलुरु (Bengluru) पहुंचे थे, बेटी-दामाद और नाती के साथ होली मनाने. 10 को होली थी, 15 को वापसी होनी थी, पर कुछ सोचकर यात्रा निरस्त कर दी. अब बेंगलुरु में ही कैद हैं. सकारात्मक सोच है और बेटी के घर में हैं सो, बहुत परेशान तो नहीं हैं, लेकिन अब दिन लम्बे खिंचने और बेंगलुरू में बढ़ते कोरोना मामलों से चिंतित तो हैं ही. फेसबुक पोस्ट पर लिखा- ‘बेंगलुरू में हूँ. कैद. यह समय की मांग है.’ अगली पोस्ट में लिखा ‘बेंगलुरु में किताबें हैं लेकिन कम हैं और जो हैं अधिकांश पढ़ी हुई हैं’... कहीं से रेणु रचनावली मंगाकर उसमें डूबे हुए दिखे... लेकिन आज ताज पोस्ट में लिखते हैं- ‘लिखना तो सम्भव ही नहीं. ...मैं इस मन:स्थिति में लिख नहीं सकता. पढने में भी जी उचट जा रहा है. गनीमत है कि रेणु की पुस्तकें पास में हैं, पढ़ने के लिए... फिर भी बीच–बीच में अजीब सी अकुलाहट हो रही है... मैं कई-कई दिन तक अकेला रहा हूँ. रहता हूँ...पर यह घर में बंद रहना कुछ अलग ही है.’ हालाँकि, परिवार साथ है, सो कोई बड़ी दिक्कत भी नहीं, लेकिन पटना का घर जिस एक सप्ताह में लौटने की तय्यारी से बंद कर के गये थे, उसने चिंता में जरूर डाला हुआ है.

लखनऊ से आकर पटना में कैद...

मैं खुद भी जब इन पंक्तियों को लिख रहा हूँ, पटना में कैद हूँ. पत्नी की मां की हालत काफी गम्भीर थी, सो मौजूदा हालात में न चाहते हुए भी पत्नी को लेकर लखनऊ से आना पड़ा. हालाँकि जब तक सोचता, पता चला कि मां नहीं रहीं. ट्रेन-प्लेन रद्द होने का अंदेशा था ही, सो अपनी कार से आया कि अगले ही दिन वापस लौट जाऊँगा. साथ में बेटा था, सो अकेले ड्राइविंग का टेंशन भी नहीं था. कार लखनऊ में भी सैनिटाइज करा ली थी, वापसी पर यहाँ से भी यही प्लान था. रास्ते भर कहीं चाय के लिए भी नहीं उतरे. सारे इंतजाम गाड़ी में ही रख लिए थे. लेकिन अब पटना में कैद हूँ. सोच रहा हूँ कि, क्या पूरी तरह सैनिटाइज कार, रास्ते में कहीं न उतरने, न खाने-पीने की खुद पर, खुद की थोपी इन शर्तों के साथ भी वापस जा पाऊँगा! गनीमत है कि दोनों के लैपटॉप आदतन साथ हैं, लेकिन कपड़े वगैरह महज दो-तीन दिन के लिए थे सो दिक्कत बड़ी है.

लखनऊ में घर में सबकुछ व्यवस्थ्ति है, क्योंकि दो ही दिन में वापस चले जाना था. इतना कि सब्जी, फल, दूध के पैकेट और बाकी जरूरी चीजें भी. अब चिंता हो रही है कि लगातार ताला बंद रहने से वहां तो बहुत कुछ बिगड़ेगा ही, बेटा साथ में है, इसका बड़ा नुकसान हो रहा है. मैं तो यहाँ से भी ‘वर्क फ्रॉम होम’ किसी तरह कर ले रहा हूँ, लेकिन बेटे के अंतिम सेमस्टर की त्य्यारियों को झटका लगा है. उसका सारा कुछ यूं भी लखनऊ में ही है (दो दिन के लिए क्या-क्या लेकर आता!). उसके सारे असाइनमेंट, सारी तय्यारी वीडियोज पर निर्भर है, यानी ‘तेज चाल वाले इंटरनेट’ पर. और सुशासन प्रदेश के इस इलाके में तो नेटवर्क के भी तमाम सारे इश्यूज हैं (डिजिटलाइजेशन के इस हाईटेक दौर के बावजूद). नेटवर्क की इन्हीं दिक्कतों से बेटे का एक ऑनलाइन इंटरव्यू भी कल प्रभावित हो चुका है. हालाँकि कम्पनी वाले अच्छे हैं, सो शायद आगे इसे फिर से शेड्यूल कर दें. लेकिन चिंता तो वही न कि आखिर कब तक. 21 दिन की सीमा आगे भी बढ़ सकती है. शायद बढ़नी ही चाहिये...! फ़िलहाल तो नई जगह, नये हालात उसका तनाव बढ़ा रहे हैं. स्वाभाविक है मेरा भी.

अब ऐसे हालात में 67 वर्ष की कोई महिला, बुजुर्ग पति को समस्तीपुर में छोड़कर अंतिम क्षणों में अपनी मां को देखने पटना आई और यहीं पर अटक कर रह गईं हों. उन्हें वापसी की कोई सूरत भी न दिख रही हो, बुजुर्ग और एक उधार के सहायक के सहारे वहां पड़े अस्वस्थ पति की चिंता भी खाए जा रही हो, तो ऐसे मामले में भी किसी की कुछ तो जिम्मेदारी बनती होगी. बननी चाहिए.

खैर, इतना सब बताने का मकसद यह बिलकुल नहीं कि लॉकडाउन गलत है. दरअसल इसे तो बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था और तब शायद यह संख्या इतना आगे भी न जा पाती. केरल की तरह अन्य राज्यों को भी समय रहते कुछ करना था. खैर, बात बिगड़ने के बाद ऐसी बातों का कोई अर्थ नहीं रह जाता...

लोग सोशल डिस्टेंसिंग का भी खूब पालन कर रहे हैं
लोग सोशल डिस्टेंसिंग का भी खूब पालन कर रहे हैं
यह कोई ‘दंगा कर्फ्यू’ नहीं है. दंगाइयों को नहीं रोका जाना है. यहाँ मकसद एक अत्यंत गम्भीर वायरस को फैलने से रोकना है और इसके लिए उन्हीं पर ‘सख्ती’ की जानी है, जो पहले से इसके ‘शिकार’ हैं या इससे डरे हुए. हम सब जो घरों में कैद होने को मजबूर हैं, कोरोना के शिकार ही तो हैं. ऐसे में तन्त्र चलाने वालों और उनके निर्देश का पालन कराने वालों के रुख और रवैये की बड़ी भूमिका है.

... लेकिन इस कठिन दौर में सारे कठिन दिखने वाले इंतजामों के बीच कुछ स्पेस निकालने की जरूरत तो है. कोविड-19 के संक्रमण के इस डरावने सच के दौर में इस चेन को तत्काल तोड़ने की जरूरत है और यह लॉकडाउन के बिना सम्भव नहीं है. इस पर किसी को आपत्ति भी नहीं हो सकती. ये दरअसल मेडिकल इमरजेंसी का दौर है.

जनता तो पूरी तरह साथ है

यह भी कि जनता ने जिस तरह खुले मन से ‘जनता कर्फ्यू’ का साथ दिया और शंख-थाली तक बजा दी, वह आश्वस्त करता है कि ‘आप’ सब कुछ करने की स्थित में हैं, सक्षम हैं, सफल हैं. लेकिन सख्त एक्शन और सफल नतीजों के लिए सिस्टम का संवेदनशील होना भी बहुत जरूरी है. ‘सख्ती’ का संदेश इतना सख्त है कि नीचे वाले किसी की सुन ही नहीं रहे. कोई स्कूटर-बाइक से सब्जी-सामान लेने निकले पड़े तो उसकी चाबी लेकर गाड़ी सीज कर दी जा रही है. बकायदे पीसीआर पर ऐसे संदेश सुने जा रहे हैं कि- ‘किसी की न सुनें, चाबी ले लें, गाड़ी सीज कर दें. कागजी कार्रवाई बाद में होती रहेगी’. सच है कि तमाम इंतजामों के बावजूद ‘तन्त्र’ की ऐसी बेरुखी इंतजामों के प्रति अविश्वास पैदा करती है.

सख्त संदेशों में भी मुलायमियत की दरकार

ऊपर से सख्त दिखने वाले संदेशों में भी लागू करने के स्तर पर एक मुलायमियत दिखती है. यहाँ भी दिख रही है. पुलिस वाले आमतौर पर सपोर्टिव हैं, लेकिन कहीं-कहीं बहुत सख्त. वहां भी जहाँ इसकी जरूरत नहीं. उनकी मजबूरी समझी जा सकती है. लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि यह कोई ‘दंगा कर्फ्यू’ नहीं है. दंगाइयों को नहीं रोका जाना है. यहाँ मकसद एक अत्यंत गम्भीर वायरस को फैलने से रोकना है और इसके लिए उन्हीं पर ‘सख्ती’ होनी है जो पहले से इसके ‘शिकार’ हैं या इससे डरे हुए. हम सब जो घरों में कैद होने को मजबूर हैं, कोरोना के शिकार ही तो हैं. ऐसे में तन्त्र चलाने वालों और उनके निर्देश का पालन कराने वालों के रुख और रवैये की बड़ी भूमिका है. क्योंकि यह ‘रुख’ ही है जो ‘बड़े से बड़े’ और ‘सख्त से सख्त’ संदेश को भी जनप्रिय बना देता है और मुलायम दिखते संदेश को भी अलोकप्रिय. इस वक्त इस पर भी सोचने की जरूरत है.

एडवाइजरी में कुछ मिसिंग है...

कोरोना संकट और लॉकडाउन को लेकर सरकार ने तमाम तरह की एडवाइजरी जारी की हैं. उनमें वह सब कुछ है, जो रोजमर्रा के लिए जरूरी है, लेकिन बहुत कुछ है जिसे एड्रेस ही नहीं किया गया. ऐसा नहीं कि नियम और एडवाइजरी बनाने वालों को इन दिक्कतों का अहसास ही नहीं है. उन्हें बखूबी पता है कि ये दिक्कतें आएँगी. बस वो एड्रेस नहीं करना चाहते. ऐसे ही इंतजामों में अगली पंक्ति में रहने वाले एक अफसर की मानें तो ऐसे प्रावधान इसलिए भी नहीं रखते अफसर, कि उन्हें ऊपर वाले की फटकार का भय रहता है. लेकिन फिर भी लगता है कि कुछ तो ऐसा होना चाहिए था, जो बताता कि ऐसी मुसीबत के मारे, दूसरे शहरों में फंस गये लोग आखिर ऐसे वक्त में कहां सम्पर्क करें. किससे मदद मांगें?

वे अपने घोसले तक वापस कैसे पहुंचें!

यह सवाल सोशल मीडिया पर भी जेरे बहस है कि इस अत्यंत जरूरी पहलू पर कोई तवज्जो ही नहीं दी गई. ऐसे दौर में जब हमारी बहुत बड़ी आबादी होस्टल, मेस, कैंटीन और पीजी के भरोसे हो, दैनिक मजदूरी करने के लिए दूर-दराज से आये लाखों-करोड़ों लोग बिना किसी स्थाई ठीहे के रह रहे हों, अचानक इस लॉकडाउन ने उन्हें दर-बदर कर दिया है. वे जहाँ हैं, वहां उनके लिए न काम रहा न ठौर, ऐसे में इन या उन जैसे लोगों को सुरक्षित वापस उनके घोसले तक पहुँचाने की जिम्मेदारी इसी तन्त्र की थी. इसी तन्त्र को यह भी सुनिश्चित करना था कि किसी मजबूरी में दूसरे शहरों में फंस गये लोगों की कोई सुनता और उनकी वापसी का सुरक्षित रास्ता देता. या कम से कम उनके खाने-रहने-दवा का फौरी लेकिन सुरक्षित इलाज की व्यवस्था तो करता. अभी वक्त है, कोई ऐसी हेल्पलाइन/फीडबैक सिस्टम चलाकर ऐसे जरूरत मंद लोगों की जानकारी इकट्ठी कर उन्हें सहायता पहुँचाने की जरूरत है.

हरेंदर महतो की कहानी भी कुछ कहती है...

दिल्ली से अपने तीन रिक्शे/ठेले पर ही बिहार के लिए परिवार के साथ चल पड़े इस मजदूर परिवार की कहानी इस पूरे एपिसोड को मार्मिक बना रहा है. हरेंदर महतो जिस तरह ट्रेन-बस न होने के कारण पहले छटपटाते रहे, और अब ठेले/रिक्शे पर ही एक हजार किलोमीटर दूर मोतिहारी के लिए निकल पड़े हैं, आखिर करते भी क्या. 'आजतक' के रिपोर्टर ने हरेंदर महतो के बारे में ठीक ही लिखा –“जब कोई घर ही नहीं तो दरवाजा कहां से होगा, और दरवाजा ही नहीं तो लक्ष्मण रेखा कौन सी और कहां खींचते”. बीती 22 तारीख से काम नहीं मिला था. कहां से खरीदते 21 रोज का सामान और किसी तरह आ भी जाता तो रखते कहां. सो चल पड़े अपनी भूख, अपनी प्यास, अपने पसीने के साथ लड़ने खुद से...और शायद कोरोना वायरस से भी.

Lucknow in lockdown
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