UP: कैदियों के 'रेडियो' ने जेलों में दबा दी कोरोना के कोहराम की आवाज
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UP: कैदियों के 'रेडियो' ने जेलों में दबा दी कोरोना के कोहराम की आवाज

यूपी की जेलों में कोरोना काल के कोहराम को जमींदोज करने के वास्ते यहां बंद कैदियों ने नायाब फामूर्ला खोजा है। सूबे की 71 में से फिलहाल यह फामूर्ला 26 जेलों में खूब फल-फूल रहा है। फामूर्ला है 'जेल-रेडियो' का। जिसे कैदियों ने खुद ही तैयार किया है।

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यूपी की जेलों में कोरोना काल के कोहराम की चीख-पुकार को जमींदोज करने के वास्ते यहां बंद कैदियों ने नायाब फामूर्ला खोजा है। सूबे की 71 में से फिलहाल यह फामूर्ला 26 जेलों में खूब फल-फूल रहा है। फामूर्ला है 'जेल-रेडियो' का। जिसे कैदियों ने खुद ही तैयार किया है। खुद ही एनाउंसर (उदघोषक) हैं, खुद ही वाचक और श्रोता। मतलब जेलों में चल रहे इन सभी जेल-रेडियो प्रसारण केंद्रों का संचालन पूरी तरह से कैदियों के ही हाथों में है।

जानकारी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 71 जेल हैं। इनमें हाल-फिलहाल 90 हजार से ज्यादा कैदी बंद थे। कोरोना काल शुरू होते ही भीड़ कम करने के उद्देश्य से 2251 सजायाफ्ता और 13453 विचाराधीन यानि कुल करीब 15704 कैदी अस्थाई रुप से कुछ समय के लिए जमानत पर छोड़ दिये गये। फिर भी करीब 75 हजार कैदी इन जेलों में अभी भी बंद हैं। इन तमाम तथ्यों की पुष्टि उत्तर प्रदेश जेल महानिदेशालय प्रवक्ता संतोष वर्मा ने भी की।

उत्तर प्रदेश जेल महानिदेशक आनंद कुमार के मुताबिक, "कोरोना को लेकर लॉकडाउन मार्च में जब लागू हुआ, मैंने उससे पहले ही यानि 12 मार्च 2020 के आसपास जेलों को अलर्ट जारी कर दिया था। ताकि कोरोना का प्रकोप जेल में बंद कैदी और उनकी सुरक्षा में जुटे अफसरों सुरक्षा कर्मियों पर न पड़े। उसी वक्त से राज्य की हर जेल में थर्मल स्कैनिंग इत्यादि की उपलब्धता सुनिश्चित करा दी गयी थी।"

डीजी जेल ने बताया, "जेल में बंद कैदियों ने इस दुख और मुसीबत की घड़ी में अपना वक्त खुशगवारी में काटने का भी साधन खुद ही जेल में तैयार किया है। यह हैरतंगेज साधन है जेल-रेडियो। जेल में रेडियो की बात सुनकर सब चौंक पड़ते हैं। मगर यही जेल रेडियो आज कोरोना की लड़ाई जितवाने में जेल के भीतर बंद कैदियों के बहुत काम आ रहा है।"

जेल महानिदेशालय प्रवक्ता संतोष वर्मा आगे बताते हैं, "मेरठ जेल में हम लोगों ने अब तक 100 पीपीटी किट तैयार की हैं। एक किट बनाने में औसतन 600 रुपये लागत आ रही है। इस पीपीटी किट में लगने वाला 95 रुपये वाला मास्क ही बाहर से पांच-छह गुनी कीमत पर मिल पा रहा है। फिर भी हमारी कोशिश है कि हम जितने ज्यादा पीपीटी किट बनाकर दे दें उतना अच्छा है। पीपीटी किट बनाने का काम लखनऊ आदर्श जेल में भी हो रहा है। अब तक हम 132 पीपीटी किट विशेष आग्रह पर बनाकर बलरामपुर अस्पताल को दे चुके हैं।"

बकौल राज्य जेल महानिदेशक आनंद कुमार, "हमारी कोशिश है रही है कि जिन जेलों में सिलाई मशीनें नहीं थीं। वहां भी सरकार ने सिलाई मशीने सिर्फ इसलिए मुहैया कराईं ताकि हम ज्यादा से ज्यादा मास्क बनाकर तैयार कर सकें।"

इन तमाम फुलप्रूफ इंतजामों के बाद भी आगरा व सूबे की कुछ अन्य जेलों में भी कोरोना पॉजिटिव केस क्यों आ रहे है? कुछ कैदी मर भी चुके हैं? पूछे जाने पर जेल महानिदेशक ने कहा, "आगरा जेल में एक कैदी की मौत का मामला सामने आया है। हम भरसक प्रयास कर रहे हैं कि, दिन-रात एहतियात बरत कर किसी भी कीमत पर जेलों को कोरोना के कहर से बचाना है। इंतजामों के साथ साथ हम लोगों मानवीय स्तर पर भी हरसंभव प्रयास करने में जुटे हैं।"

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