पार्किं सन पर दिल्ली विश्वविद्यालय में निर्णायक शोध, अमेरिका भी आया साथ

दुनिया भर में 10 मिलियन से अधिक लोगों को पार्किं सन रोग है। पार्किं सन रोग (पीडी) एक न्यूरो-डीजेनेरेटिव विकार है और इसके इलाज के लिए कोई दवा उपलब्ध नहीं है।
पार्किं सन पर दिल्ली विश्वविद्यालय में निर्णायक शोध, अमेरिका भी आया साथ

दुनिया भर में 10 मिलियन से अधिक लोगों को पार्किं सन रोग है। पार्किं सन रोग (पीडी) एक न्यूरो-डीजेनेरेटिव विकार है और इसके इलाज के लिए कोई दवा उपलब्ध नहीं है।

हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय ने अब एक खास प्रोटीन की पहचान की है, जिससे इस बीमारी का उपचार संभव है। इस अनुसंधान में मैकलीन अस्पताल, बोस्टन भी दिल्ली विश्वविद्यालय का सहयोगी है।

पीडी के सामान्य लक्षण कंपकंपी, अकड़न, धीमी गति और चलने में कठिनाई हैं, जो संज्ञानात्मक और व्यवहार संबंधी समस्याओं जैसे अवसाद, चिंता और उदासीनता का कारण बनता है।

इस रोग का प्राथमिक कारण मस्तिष्क के मध्य भाग में स्थित सब्सटेंशिया निग्रा में न्यूरॉन कोशिकाओं की मृत्यु है। यह डोपामाइन की कमी का कारण बनता है। कुछ प्रोटीन ऐसे हैं जो डोपामाइन न्यूरॉन्स के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं। इस बीमारी को दूर करने के लिए स्वस्थ डोपामाइन न्यूरॉन्स की आवश्यकता होती है और नर 1 प्रोटीन स्वस्थ डोपामाइन न्यूरॉन्स को बनाए रखता है और पीडी और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों के मामले में न्यूरॉन्स को इन्फ्लमेशन से भी बचाता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग में प्रोफेसर डीएस रावत ने आईएएनएस को बताया कि इसलिए यह सोचा गया कि यह पाकिंर्संस रोग के लिए दवा के विकास का लक्ष्य हो सकता है। हमें केवल एक अणु की आवश्यकता थी जो नर 1 प्रोटीन को सक्रिय कर सके जो बदले में स्वस्थ डोपामिन न्यूरॉन्स को बनाए रख सके।

प्रोफेसर डीएस रावत के नेतृत्व में ही अनुसंधान समूह ने मैकलीन अस्पताल, बोस्टन में प्रोफेसर किम के साथ सहकार्य शुरू किया और 2014 में इस काम को एमजे फॉक्स फाउंडेशन द्वारा वित्त पोषित किया गया था। दिल्ली विश्वविद्यालय और मैकलीन अस्पताल, बोस्टन, यूएसए के बीच एक औपचारिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इसके परिणामस्वरूप एक संयुक्त अमेरिकी पेटेंट और पीसीटी अंतरराष्ट्रीय पेटेंट आवेदन हुआ।

दिल्ली विश्वविद्यालय और मैकलीन अस्पताल ने नर 1 फार्मास्युटिकल्स, बोस्टन, यूएसए के साथ एक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं ताकि इन अणुओं को पार्किं सन रोग के उपचार के लिए नवीन रोग-संशोधित दवाओं के रूप में विकसित किया जा सके।

दिल्ली विश्वविद्यालय में एक बड़े पैमाने पर संश्लेषणात्मक कार्यक्रम शुरू किया गया। 650 से अधिक नए यौगिकों को मोहित त्रिपाठी, सनी मनोहर, वी सत्यपवन, रोहित खोलिया, शमशीर और अनुज ठाकुर नामक टीम के सदस्यों द्वारा संश्लेषित किया गया था।

प्रोफेसर डीएस रावत ने कहा कि इन सभी यौगिकों को उनकी नर 1 सक्रियण क्षमता के लिए जांचा गया। दिलचस्प बात यह है कि ये यौगिक नर 1 प्रोटीन को सक्रिय करते हैं जो डोपामाइन न्यूरॉन्स के अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, अत पार्किं सन रोग की संभावना को कम करते हैं।

इन अणुओं के साथ-साथ क्लोरोक्वीन और एमोडायक्वीन - जिन्हें प्रारंभिक जांच में पहचाना गया था। इनको प्रयोगात्मक रूप से नर 1 को संयोजन और सक्रिय करने और चूहे के मॉडल में पीडी से संबंधित लक्षणों को बिना किसी विषाक्तता के काफी हद तक सुधारने के लिए प्रदर्शित किया गया था।

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