हिमंत बिस्वा सरमा का तंज, बोले- "वीर सावरकर पर टिप्पणी करके राहुल गांधी ने पाप किया"

हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि अगर हम इतिहास पढ़ें, तो यह बताया गया है कि मुगलों ने भारत के राजाओं पर विजय प्राप्त की थी, लेकिन दक्षिण और उत्तर पूर्व भारत के हिस्से को उनके द्वारा नहीं जीता गया, जिसका अर्थ है कि उन्होंने पूरे भारत को नहीं जीता।
हिमंत बिस्वा सरमा का तंज, बोले- "वीर सावरकर पर टिप्पणी करके राहुल गांधी ने पाप किया"

असम के अहोम राजवंश के वीर सेनापति लचित बोरफुकन की 400वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया कि मुगलों ने पूरे भारत पर राज नहीं किया था। 

हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि अगर हम इतिहास पढ़ें, तो यह बताया गया है कि मुगलों ने भारत के राजाओं पर विजय प्राप्त की थी, लेकिन दक्षिण और उत्तर पूर्व भारत के हिस्से को उनके द्वारा नहीं जीता गया, जिसका अर्थ है कि उन्होंने पूरे भारत को नहीं जीता।

मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि इतिहासकारों ने औरंगजेब को सबसे महान शासक के रूप में चित्रित किया, अगर वह इतना महान था तो उसने पूर्वोत्तर और दक्षिणी हिस्सों को क्यों नहीं जीत लिया? उन्होंने कहा कि हमारे इतिहासकारों ने हमें पराजित होने वाले के रूप में पेश किया। हमें इतिहास को फिर से लिखने की जरूरत है क्योंकि मुगलों ने भारत के केवल एक हिस्से पर शासन किया, न कि पूरे देश पर।

सीएम सरमा ने आगे कहा कि विनायक दामोदर सावरकर 26 साल तक जेल में रहे थे, अगर कोई उनपर सवाल उठाता है, तो उसे उन्हीं की तरह बलिदान करना चाहिए। राहुल गांधी आज उन पर सवाल उठा रहे हैं। यह राहुल गांधी द्वारा किया गया पाप है। सावरकर ने राष्ट्रवाद पर गर्व करने वाली सभ्यता के आधार पर आज का भारत बनाया। उन्होंने कहा कि वामपंथियों की हमेशा से एक साजिश थी कि भारत की हार हुई और औरंगजेब ने भारत पर शासन किया। वामपंथी इतिहासकारों ने लचित बोरफुकन और छत्रपति शिवाजी की उपेक्षा की क्योंकि उन्होंने मुगलों को हराया था।

कौन थे लचित बोरफुकन?
लचित बोरफुकन को 'चाउ लासित फुकनलुंग' के नाम से भी जाना जाता है। वह 17वीं शताब्दी के एक महान और वीर योद्धा थे। उनकी वीरता के कारण ही उन्हें पूर्वोत्तर भारत का वीर 'शिवाजी' कहा जाता है। उन्होंने मुगलों के खिलाफ जो निर्णायक लड़ाई लड़ी थी, उसके लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है। उनका जन्म 24 नवंबर 1622 को चराइदेव जिले में हुआ था।

लचित बोरफुकन बोरबरुवा ऊपरी असम के राजा प्रताप सिंह के अधीन आहोम सेना के कमांडन-इन-चीफ मोमाईतामुली बोरबरुवा के सबसे छोटे पुत्र थे। उन्हें चक्रध्वज सिंह द्वारा बोरफुकन के पद के लिए चुना गया था। वर्ष 1671 में सराईघाट की लड़ाई में उनके द्वारा किए गए नेतृत्व के लिए उन्हें जाना जाता है। सराईघाट की लड़ाई में असमिया सेना की विजय के उपलक्ष्य में हर साल असम में 24 नवंबर को 'लचित दिवस' के रूप में मनाया जाता है।लचित के नाम पर ही नेशनल डिफेंस एकेडमी (राष्ट्रीय रक्षा अकादमी) में बेस्ट कैडेट गोल्ड मेडल भी दिया जाता है, जिसे लचित मेडल कहा जाता है। 

अहोम राजवंश में 1665 में लचित को अहोम सेना का मुख्य सेनाध्यक्ष यानी बोरफुकन बनाया गया। अहोम सेना में दस जवानों का नायक 'डेका' कहलाता था, 100 का सैनिया, एक हजार का हजारिका, तीन हजार का राजखोवा और छह हजार जवानों का नायक फूकन कहलाता था। बोरफुकन उन सभी का प्रमुख होता था। लचित को असम से मुगलों को भगाने के लिए जाना जाता है। अहोम राजा चक्रध्वज सिंह ने उन्हें गुवाहाटी से मुगलों को खदेड़ने की जिम्मेदारी सौंपी थी। उस वक्त अहोम सेना में गुटबाजी चरम पर थी। सेनापति लचित ने 1667 ईस्वी में मुगल सम्राट औरंगजेब को चुनौती दी थी और न सिर्फ चुनौती बल्कि उसकी सेना को बुरी तरह हराया भी था।

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