बहुविवाह और निकाह हलाला के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई जल्द, सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने मंगलवार को मुस्लिमों में बहुविवाह और निकाह हलाला की प्रथा को खत्म करने के लिए कई याचिकाओं पर नोटिस जारी किया और दशहरा की छुट्टियों के बाद याचिकाओं पर सुनवाई का समय निर्धारित किया।
बहुविवाह और निकाह हलाला के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई जल्द, सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने मंगलवार को मुस्लिमों में बहुविवाह और निकाह हलाला की प्रथा को खत्म करने के लिए कई याचिकाओं पर नोटिस जारी किया और दशहरा की छुट्टियों के बाद याचिकाओं पर सुनवाई का समय निर्धारित किया।

इन प्रथाओं को चुनौती देने वाली नौ याचिकाओं को मंगलवार को पांच-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था, जिसमें जस्टिस इंदिरा बनर्जी, हेमंत गुप्ता, सूर्यकांत, एम.एम. सुंदरेश और सुधांशु धूलिया।

याचिका मुस्लिम महिलाओं द्वारा दायर की गई है और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने बहुविवाह और निकाह हलाला की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। मार्च 2018 में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने ये मामले 5 न्यायाधीशों की पीठ को भेजे थे।

शीर्ष अदालत ने मंगलवार को केंद्र सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, विधि आयोग आदि को नोटिस जारी कर मामले की सुनवाई दशहरा की छुट्टियों के बाद की तारीख तय की।

उपाध्याय की याचिका में कहा गया है कि तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला से महिलाओं को नुकसान पहुंचता है और यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन है। ऐसी सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 को असंवैधानिक और संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन घोषित करने का निर्देश देने की मांग की गई है।

उपाध्याय की याचिका में कहा गया है, यह अच्छी तरह से तय है कि पर्सनल लॉ पर कॉमन लॉ की प्रधानता है। इसलिए न्यायालय यह घोषणा कर सकता है कि - तीन तलाक आईपीसी, 1860 की धारा 498ए के तहत क्रूरता है, निकाह हलाला आईपीसी, 1860 की धारा 375 के तहत दुष्कर्म है और बहुविवाह आईपीसी, 1860 की धारा 494 के तहत अपराध है।

अगस्त 2017 में शीर्ष अदालत ने माना था कि तीन तलाक की मुस्लिम प्रथा असंवैधानिक है और इसे 3:2 बहुमत से रद्द कर दिया था। बहुविवाह एक मुस्लिम पुरुष को चार पत्नियां रखने की अनुमति देता है और किसी मुस्लिम महिला का एक बार तलाक हो जाने के बाद उसके पति को उसे वापस लेने की अनुमति नहीं है, भले ही उसने किसी नशे के प्रभाव में तलाक का उच्चारण किया हो।

2017 के फैसले में शीर्ष अदालत ने तीन तलाक की प्रथा को खारिज करते हुए बहुविवाह और निकाह हलाला के मुद्दे को खुला रखा था।

याचका में कहा गया है कि धार्मिक नेता और पुजारी जैसे इमाम, मौलवी, आदि जो तलाक-ए-बिदत, निकाह हलाला और बहुविवाह जैसी प्रथाओं का प्रचार, समर्थन और अधिकृत करते हैं, मुस्लिम महिलाओं को इस तरह अपने अधीन करने के लिए अपने प्रभाव और शक्ति का घोर दुरुपयोग कर रहे हैं। ये प्रथाएं महिलाओं को संपत्ति मानती हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में निहित उनके मूल अधिकारों का हनन है।

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