बेनामी संपत्ति कानून पर सुप्रीम कोर्ट का आया बड़ा फैसला, जानिए क्या कहा..

बेनामी संपत्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हाल में बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम, 1988 की धारा 3 (2) को असंवैधानिक घोषित कर दिया है।
बेनामी संपत्ति कानून पर सुप्रीम कोर्ट का आया बड़ा फैसला, जानिए क्या कहा..

अगर आप प्रॉपर्टी में डील करते हैं, तो शायद आप इन तीन शब्दों से परिचित होंगे। पर सवाल ये है कि क्यों ये कानून एक बार फिर सुर्खियों में आ गया। सुप्रीम कोर्ट को आखिर इस कानून में क्यो और क्या बदलाव करना पड़ा।

बेनामी संपत्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हाल में बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम, 1988 की धारा 3 (2) को असंवैधानिक घोषित कर दिया है।

इसके बाद अब बेनामी संपत्ति मामले में दोषी ठहराए जाने पर 3 साल की सजा का प्रावधान अब खत्म हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 2016 संशोधित बेनामी अधिनियम को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता।

यानी 2016 में संशोधन के जरिये लाए गए कानून के तहत उन लेनदेन को जब्त नहीं किया जा सकता जो 5 सितंबर 1988 से 25 अक्टूबर 2016 के बीच हुए हैं। बेनामी संपत्ति वह प्रॉपर्टी है, जिसकी कीमत किसी और ने चुकाई हो लेकिन, नाम किसी दूसरे व्यक्ति का हो। जिसके नाम पर ऐसी संपत्ति खरीदी गई होती है, उसे बेनामदार कहा जाता है।

सरल शब्दों में कानून को समझते हैं, अगर A ने संपत्ति के लिए भुगतान किया है, लेकिन यह किसी अन्य व्यक्ति B के नाम पर है, तो इसे बेनामी संपत्ति के रूप में लेबल किया जाता है। यदि या तो A या B काल्पनिक हैं, तो संपत्ति को बेनामी संपत्ति माना जाता है।

हालांकि, जब संपत्ति एक हिंदू अविभाजित परिवार यानी HUF के सदस्य के पास HUF की ओर से या उसके पति या पत्नी या बच्चों की ओर से होती है, तो इसे बेनामी नहीं माना जा सकता है।

कानून के अनुसार, केंद्र बेनामी संपत्ति के रूप में टैग की गई किसी भी संपत्ति को जब्त कर सकता है। अधिनियम के तहत कैश और संवेदनशील जानकारी को ‘संपत्ति’ भी कहा जा सकता है। अब इस कानून का इतिहास जान लेते हैं।

दरअसल, भारत में बढ़ते काले धन की समस्या से निजात पाने के लिए मोदी सरकार ने नवम्बर 2016 में नोटबंदी लागू की। इसी दिशा में सरकार ने एक कदम और आगे बढ़ाकर बेनामी सपत्ति कानून, 1988 में परिवर्तन किया और वर्ष 2016 में इसमें संशोधन हुआ।

इस कानून की उप-धारा (2) कहती है कि अगर कोई व्यक्ति बेनामी संपत्ति के लेन देन में शामिल पाया जाता है तो उसे तीन साल तक जेल या जुर्माना या फिर दोनों की सजा हो सकती है। 2016 में संशोधन के तहत बेनामी संपत्तियों को जब्त एवं सील करने का भी प्रावधान था।

अब ये जान लेते हैं कि सजा को रद्द करने की नौबत क्यों आई? सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जो फैसला सुनाया उसका कनेक्शन कोलकाता हाईकोर्ट के फैसले से है। दरअसल, पहले गणपति डीलकॉम मामले की सुनवाई करते हुए कोलकाता हाईकोर्ट ने यही फैसला सुनाया था।

उस फैसले पर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी उसी फैसले को सही ठहराते हुए सजा को रद्द किया।

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