पढ़ें गंगोत्री धाम की यात्रा और प्रमुख पर्यटन स्थल के बारे में

गंगोत्री धाम के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित हैं, जिसमे राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजो के पापो को धोने के लिए देवी गंगा को धरती पर लाने के लिए तपस्या की और जल के रूप में देवी गंगा ने भगवान शिव की जटाओं से होते हुए धरती तक का सफ़र तय किया।
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गंगोत्री धाम उत्तरकाशी में स्थित एक तीर्थस्थल हैं यह स्थान चार धामों में से एक हैं। गंगोत्री धाम के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित हैं, जिसमे राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजो के पापो को धोने के लिए देवी गंगा को धरती पर लाने के लिए तपस्या की और जल के रूप में देवी गंगा ने भगवान शिव की जटाओं से होते हुए धरती तक का सफ़र तय किया। यही से हिमालय का हिमनद भी निकला हैं जिसे भागीरथी भी कहां जाता हैं।

देवप्रयाग से गुजरने और अलकनंदा नदी में विलीन होने के बाद इस नदी का नाम गंगा रखा जाता हैं। गंगोत्री धाम पर्यटकों के लिए अतिप्रिय तीर्थ स्थल है, यहां आने वाले पर्यटकों की तादाद वर्ष भर बहुत अधिक होती हैं।

यदि आप भी इस पावन धाम की यात्रा का विचार बना रहे हैं, तो हमारे इस लेख को एक बार जरूर पढ़े –

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गंगोत्री का पौराणिक कथा :-

पौराणिक कथाओ के अनुसार भगवान श्री रामचंद्र के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर की प्रचंड तपस्या की थी। इस पवित्र शिलाखंड के निकट ही 18 वी शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण किया गया।

ऐसी मान्यता है कि देवी भागीरथी ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया। ऐसी भी मान्यता है कि पांडवो ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गये अपने परिजनो की आत्मिक शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ का अनुष्ठान किया था। यह पवित्र एवं उत्कृष्ठ मंदिर सफेद ग्रेनाइट के चमकदार 20 फीट ऊंचे पत्थरों से निर्मित है। दर्शक मंदिर की भव्यता एवं शुचिता देखकर सम्मोहित हुए बिना नहीं रहते।

शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न है। यह दृश्य अत्यधिक मनोहार एवं आकर्षक है। इसके देखने से दैवी शक्ति की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है।

पौराणिक आख्यानो के अनुसार, भगवान शिव इस स्थान पर अपनी जटाओ को फैला कर बैठ गए और उन्होने गंगा माता को अपनी घुंघराली जटाओ में लपेट दिया। शीतकाल के आरंभ में जब गंगा का स्तर काफी अधिक नीचे चला जाता है तब उस अवसर पर ही उक्त पवित्र शिवलिंग के दर्शन होते है।

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गंगोत्री धाम के प्रमुख पर्यटन स्थल :-

गंगोत्री धाम की यात्रा पर आने वाले पर्यटक इस पावन भूमि पर कई ऐसे धार्मिक और आकर्षित स्थलों पर घूमने जा सकते हैं जोकि गंगोत्री के आसपास स्थित हैं। तो आइए हम आपको गंगोत्री यात्रा के दौरान घूमने लायक स्थानों की सैर अपने इस लेख के माध्यम से कराते हैं।

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गंगोत्री मंदिर :-

गंगोत्री धाम की यात्रा में 3100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गंगोत्री मंदिर देवी गंगा को समर्पित किया गया यहां का सबसे ऊंचा मंदिर हैं और यह उत्तराखंड राज्य के चार धाम यात्रा चार छोटे तीर्थ स्थलों में से एक है।

देवी गंगा को श्रद्धेय गंगा नदी का उद्गम स्थल के रूप में जाना जाता है। यह शांतिपूर्ण सफेद मंदिर यहां के देवदार, पाइंस और ग्रेटर हिमालयन पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यहां की पवित्र नदी भागीरथी हैं जो गंगा नदी की दो प्रमुख धाराओं में से एक है और गंगोत्री मंदिर के पास से बहती है।

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गोमुख :-

गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर 3,892 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गौमुख गंगोत्री ग्लेशियर का मुहाना तथा भागीरथी नदी का उद्गम स्थल है। कहते हैं कि यहां के बर्फिले पानी में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं। गंगोत्री से यहां तक की दूरी पैदल या फिर ट्ट्टुओं पर सवार होकर पूरी की जाती है। चढ़ाई उतनी कठिन नहीं है तथा कई लोग उसी दिन वापस भी आ जाते है। गंगोत्री में कुली एवं ट्ट्टु उपलब्ध होते हैं।

25 किलोमीटर लंबा, 4 किलोमीटर चौड़ा तथा लगभग 40 मीटर ऊंचा गौमुख अपने आप में एक परिपूर्ण माप है। इस गौमुख ग्लेशियर में भगीरथी एक छोटी गुफानुमा ढांचे से आती है।

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मुखबा गांव :-

भागीरथी के अलावा इस गांव के निवासी ही गंगोत्री मंदिर के पुजारी हैं जहां मुखीमठ मंदिर भी है। प्रत्येक वर्ष दीवाली में जब गंगोत्री मंदिर बंद होने पर जाड़ों में देवी गंगा को एक बाजे एवं जुलुस के साथ इस गांव में लाया जाता है। इसी जगह जाड़ों के 6 महीनों, बसंत आने तक गंगा की पूजा होती है जब प्रतिमा को गंगोत्री वापस लाया जाता है।

केदार खंड में मुख्यमठ की तीर्थयात्रा को महत्वपूर्ण माना गया है। इससे सटा है मार्कण्डेयपुरी जहां मार्कण्डेय मुनि के तप किया तथा उन्हें भगवान विष्णु द्वारा सृष्टि के विनाश का दर्शन कराया गया। किंबदन्ती अनुसार इसी प्रकार से मातंग ऋषि ने वर्षों तक बिना कुछ खाये-पीये यहां तप किया।

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भैरों घाटी :-

धाराली से 16 किलोमीटर तथा गंगोत्री से 9 किलोमीटर। भैरों घाटी, जध जाह्नवी गंगा तथा भागीरथी के संगम पर स्थित है। यहां तेज बहाव से भागीरथी गहरी घाटियों में बहती है, जिसकी आवाज कानों में गर्जती है।

वर्ष 1985 से पहले जब संसार के सर्वोच्च जाधगंगा पर झूला पुल सहित गंगोत्री तक मोटर गाड़ियों के लिये सड़क का निर्माण नहीं हुआ था, तीर्थयात्री लंका से भैरों घाटी तक घने देवदारों के बीच पैदल आते थे और फिर गंगोत्री जाते थे।

भैरों घाटी हिमालय का एक मनोरम दर्शन कराता है, जहां से आप भृगु पर्वत श्रृंखला, सुदर्शन, मातृ तथा चीड़वासा चोटियों के दर्शन कर सकते हैं।

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हर्षिल घाटी :-

भटवारी से 43 किलोमीटर तथा गंगोत्री से 20 किलोमीटर दूर स्थितहर्षिल का वर्णन सिर्फ एक वाक्य में हो सकता हैः आर्श्ययजनक। यह हिमाचल प्रदेश के बस्पा घाटी के ऊपर स्थित एक बड़े पर्वत की छाया में, भागीरथी नदी के किनारे, जलनधारी गढ़ के संगम पर एक घाटी में अवस्थित है। बस्पा घाटी से हर्षिल लमखागा दर्रे जैसे कई रास्तों से जुड़ा है।

मातृ एवं कैलाश पर्वत के अलावा उसकी दाहिनी तरफ श्रीकंठ चोटी है, जिसके पीछे केदारनाथ तथा सबसे पीछे बदंरपूंछ आता है। यह वन्य बस्ती अपने प्राकृतिक सौंदर्य एवं मीठे सेब के लिये मशहूर है। हर्षिल के आकर्षण में हवादार एवं छाया युक्त सड़क, लंबे कगार, ऊंचे पर्वत, कोलाहली भागीरथी, सेबों के बागान, झरनें, सुनहले तथा हरे चारागाह आदि शामिल हैं।

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नंदनवन तपोवन :-

गंगोत्री से 25 किलोमीटर दूर गंगोत्री ग्लेशियर के ऊपर एक कठिन ट्रेक में नंदनवन ले जाती है जो भागीरथी चोटी के आधार (बस) शिविर गंगोत्री से 25 किलोमीटर दूर है। यहां से शिवलिंग चोटी का मनोरम दृश्य दिखता है। गंगोत्री नदी के मुहाने के पार तपोवन है जो अपने सुंदर यहां चारगाह के लिये मशहूर है तथा शिवलिंग चोटी के आधार के चारों तरफ फैली है।

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गंगोत्री चिरबासा :-

(दूरीः 9 किलोमीटर, समयः 3-4 घंटे) गौमुख के रास्ते पर 3,600 फीट ऊंचे स्थान पर स्थित चिरबासा एक अत्युत्तम शिविर स्थल (केम्प स्पॉट) है जो विशाल गौमुख ग्लेशियर का आश्चर्यजनक दर्शन कराता है। चिरबासा का अर्थ है चिर का पेड़। यहां से आप 6,511 मीटर ऊंचा मांडा चोटी, 5,366 मीटर पर हनुमान तिब्बा, 6,000 मीटर ऊंचा भृगु पर्वत देख सकते हैं। चिरबासा की पहाड़ियों के ऊपर घूमते भेड़ों को देखा जा सकता है।

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गंगोत्री-भोजबासा :-

(दूरीः 14 किलोमीटर, समयः6-7 घंटे) भोजपत्र पेड़ों की अधिकता के कारण भोजबासा गंगोत्री से 14 किलोमीटर दूर है। यह जाट गंगा तथा भागीरथी नदी के संगम पर है। गौमुख जाते हुए इसका उपयोग पड़ाव की तरह होता है।

मूल रूप से लाल बाबा द्वारा निर्मित एक आश्रम में मुफ्त भोजन का लंगर चलाता है तथा गढ़वाल मंडल विकास निगम का गृह, आवास प्रदान करता है। रास्ते में आप किंवदन्त धार्मिक फूल ब्रह्मकमल देख सकते है जो ब्रह्मा का आसन है।

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केदारताल :-

गंगोत्री से 14 किलोमीटर दूर इस मनोरम झील तक की चढ़ाई में अनुभवी आरोहियों (ट्रेकर्स) की भी परीक्षा होती है। बहुत ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों पर चढ़ने के लिये एक मार्गदर्शक की नितांत आवश्यकता होती है। रास्ते में किसी प्रकार की सुविधा नहीं है इसलिये सब कुछ पहले प्रबन्ध करना होता है। झील पूर्ण साफ है, जहां विशाल थलयसागर चोटी है।

यह स्थान समुद्र तल से 4425 फीट ऊंचा है तथा थलयसागर जोगिन, भृगुपंथ तथा अन्य चोटियों पर चढ़ने के लिये यह आधार शिविर है। जून-अक्टुबर के बीच आना सर्वोत्तम समय है। केदार ग्लेशियर के पिघलते बर्फ से बनी यह झील भागीरथी की सहायक केदार गंगा का उद्गम स्थल है, जिसे भगवान शिव द्वारा भागीदारी को दान मानते हैं। चढ़ाई थोड़ी कठिन जरूर है पर इस स्थान का सौदर्य आपकी थकावट दूर करने के लिये काफी है।

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सूर्या कुंड गंगोत्री धाम :-

सूर्यकुंड उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में स्थित प्रसिद्ध गंगोत्री मंदिर के पास एक श्रद्धालु तीर्थ स्थल है। गंगोत्री मंदिर जाने वाले तीर्थयात्री भगवान सूर्यनारायण को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इस पवित्र स्थान पर जाते हैं।

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विश्वनाथ मंदिर गंगोत्री :-

गंगोत्री धाम का पर्यटन स्थल विश्वनाथ मंदिर का निर्माण परसुराम द्वारा निर्मित करबाया गया था। उत्तरकाशी में स्थित भगवान विश्वनाथ का मंदिर केदार खंड या स्कंद पुराण में शामिल है। हालाकि बाद में वर्ष 1857 में महारानी खनेटी ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। मंदिर का सबसे अधिक आकर्षण यहां का शिवलिंग हैं जोकि 60 सेमी लंबा है और परिधि में 90 सेमी है।

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जलमग्न शिवलिंग :-

गंगोत्री धाम के प्रमुख आकर्षण में से एक जलमग्न शिवलिंग एक प्रसिद्ध शिवलिंग है। जोकि गर्मियों के दौरान गंगोत्री में डूबा रहता है। पर्यटक दूर-दूर से इस दर्शनीय शिवलिंग के दर्शन करने के लिए आते हैं।

गंगोत्री धाम घूमने का सबसे अच्छा समय :-

गंगोत्री पर्यटन स्थल जाने के लिए सबसे अच्छा समय अप्रैल से जून और सितम्बर से अक्टूबर का माना जाता हैं। क्योंकि इस स्थान पर साल के अधिकांश समय मौसम ठंडा ही रहता हैं।

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गंगोत्री धाम कैसे जाये :-

हवाई मार्ग, रेल मार्ग और सड़क मार्ग से गंगोत्री धाम पंहुचा जा सकता है।

गंगोत्री पर्यटन स्थल की यात्रा पर हवाई मार्ग से जाने के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा देहरादून का जॉली ग्रांट एयरपोर्ट है जोकि गंगोत्री से 115 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। एयरपोर्ट से आपको टैक्सी आसानी से मिल जाएगी।

गंगोत्री धाम का सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन 250 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ऋषिकेश में है। यहां से गंगोत्री के लिए बस या टैक्सी मिल जाएंगी। हरिद्वार भी एक नजदीकी रेलवे स्टेशन हैं।

गंगोत्री जाने के लिए यदि आपने सड़क मार्ग का चुनाव किया हैं तो हम आपको बता दें कि गंगोत्री पर्यटन स्थल यहां चलने वाली नियमित बसों द्वारा यमुनोत्री, मसूरी, टिहरी आदि शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।

There is a mythological legend about Gangotri Dham, in which King Bhagiratha did penance to bring Goddess Ganga to earth to wash away the sins of his ancestors, and Goddess Ganga in the form of water went to earth through Lord Shiva's shoes. Decided to travel

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