गाजीपुर बॉर्डर पर पाठशाला: कूड़ा बीनने वाले बच्चे यूनिफॉर्म पहन हर बात पर बोल रहे 'थैंक्यू'

गाजीपुर बॉर्डर पर पाठशाला: कूड़ा बीनने वाले बच्चे यूनिफॉर्म पहन हर बात पर बोल रहे 'थैंक्यू'

कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के प्रदर्शन के बीच स्थानीय इलाके के कूड़ा बीनने वाले बच्चों के लिए पाठशाला खोली गई है।

कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के प्रदर्शन के बीच स्थानीय इलाके के कूड़ा बीनने वाले बच्चों के लिए पाठशाला खोली गई है।

यह पाठशाला बच्चों और उनके व्यवहार पर इतना असर डाल रही है कि अब बच्चे छोटी-छोटी बात पर भी 'थैंक्यू' बोलते नजर आते हैं, वहीं पाठशाला में दाखिले के लिए स्थानीय इलाकों से माता-पिता अपने बच्चों को लेकर पहुंच रहे हैं।

गाजीपुर बॉर्डर पर एक पाठशाला खोली गई है जो आंदोलन में आए बच्चों के लिए थी, लेकिन धीरे-धीरे यह पाठशाला स्थानीय बच्चों के लिए हो गई है। ये वे बच्चे हैं जो कूड़ा बीनने का काम करते हैं।

सावित्री बाई फुले पाठशाला के नाम से इसे बॉर्डर पर बच्चों के लिए सुचारु रूप से चलाया जा रहा है। मौजूदा वक्त में करीब 150 बच्चे पाठशाला में पढ़ाई करने आ रहे हैं।

बच्चों के उत्साह को देख शिक्षकों ने बच्चों को एक यूनिफॉर्म दी है, जिसे पहन बच्चे पाठशाला में आने लगे हैं, वहीं किताबें रखने के लिए बैग भी मुहैया कराना शुरू कर दिया है।

पहले बच्चे घर के कपड़ों में ही चले आया करते थे, लेकिन अब वे यूनिफॉर्म में आते हैं और पढ़ाई के बाद यूनिफॉर्म उतारकर फिर से घर के कपड़े पहन कूड़ा बीनने चले जाते हैं।

गाजीपुर बॉर्डर के पास स्थानीय बस्तियों से बच्चे आकर यहां कूड़ा बीनते, प्लास्टिक की बोतलें इकट्ठा करते और यही खाना भी खाया करते थे, लेकिन अब ये बच्चे प्रारंभिक शिक्षा भी प्राप्त कर रहे हैं, जिसका असर अब बच्चों पर दिखने लगा है।

हर बात पर थैंक्यू और गलती होने पर 'सॉरी' बोलना, साफ-सुथरे बनकर पाठशाला में आना और पाठशाला में शिक्षकों द्वारा सिखाई गई जानकारी को याद रख उसे अगले दिन सुनना बच्चों को अच्छा लग रहा है।

इतना ही नहीं, बच्चे 1 से लेकर 10 तक पहाड़े तक याद कर चुके हैं। साथ ही जिन बच्चों को लिखना नहीं आता था, उन्हें लिखना भी आ गया है। यह पाठशाला आंदोलन में शामिल एक सामाजिक कार्यकर्ता महिला ने खोली है।

समाजिक कार्यकर्ता निर्देश सिंह ने आईएएनएस को बताया, "बच्चों को यूनिफॉर्म हमने ही मुहैया कराई है, अब ये बच्चे यूनिफॉर्म पहनने के बाद स्टूडेंट्स लगने लगे हैं। बैग, स्टेशनरी के सामान भी हम इन्हें मुहैया करा रहे हैं, ताकि इन बच्चों को ये ना लग सके कि हम किसी कमी के कारण पढ़ नहीं सके।"

उन्होंने कहा, "पाठशाला में एडमिशन के लिए हर दिन 2 से 4 लोग आ रहे हैं, बिना फीस के बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। इन बच्चों के अंदर परिवर्तन आता देखकर लोग अपने बच्चों का एडमिशन कराने आ रहे हैं।"

भविष्य में आंदोलन जब खत्म होगा जाएगा, तब ये बच्चे कैसे पढ़ सकेंगे? इस सवाल के जवाब में निर्देश सिंह कहती हैं, "स्थानीय स्कूलों में हम लोगों ने अपनी एक टीम को एक्टिव कर दिया है। इन बच्चों की सारी जानकारी ले रखी है। हम एक स्कीम के तहत इन बच्चों का एडमिशन स्थानीय सरकारी स्कूलों में कराएंगे।"

इस पाठशाला में दो शिफ्ट में क्लास चलती हैं। सुबह 11 से 12 बजे तक इसमें व्यावहारिक और अक्षरों का ज्ञान दिया जाता है। शाम को सुचारु रूप से क्लास चलती है।

पाठशाला में बच्चों को बताया जाता है कि एक-दूसरे की मदद करनी है, कोई चीज चोरी नहीं करनी है, साफ सुथरा होकर क्लास में आना है। ये बच्चे पहले जिस तरह बॉर्डर पर आकर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते थे, मगर अब उनके बोलने के ढंग में भी बदलाव देखने को मिल रहा है।

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